Wednesday, 18 December 2019

कुण्डलिया छंद ....वेणी, कुमकुम


[16/12 6:19 PM] पाखी जैन: वेणी ..(चोटी)
बालों वेणी गूंथ के ,चल दी दुल्हन आज
साजन से वादा किया ,करती माता नाज
करती माता नाज,सिखाती धीरज धरना
करके सारे काम ,बताती गौरव करना ।
करती वह श्रृँगार ,लगे है कितनी सोणी
सजा रही माँ  मांग ,लगाती कुंतल वेणी ।
पाखी
कुंतल -बाल
वेणी -गजरा
[16/12 6:20 PM] अटल राम चतुर्वेदी, मथुरा: वेणी
****
वेणी सिर पर सजे तो,
अद्भुत हो सिंगार।
बाल कटाने की भला,
धुन क्यों आज सवार ?

धुन क्यों आज सवार,
भ्रमित हम नर या नारी।
घर-घर की यह बात,
बहुत दिखती लाचारी।

नया कलेवर "अटल",
कामकाजी या गृहणी।
कटे दीखते बाल,
कम दिखें सिर पर वेणी।
🙏अटल राम चतुर्वेदी🙏
********************
कुमकुम
*****
कुमकुम मस्तक पर सजा,
मुख पर चमक अपार।
सधवा नारी का रहा,
सदा प्रमुख सिंगार।

सदा प्रमुख सिंगार,
चढ़ा ये फैशन की बलि।
सूनी रहती माँग,
दिखे बिंदी भर केवल।

"अटल" सुहाता नहीं,
लगा रहता जो गुमसुम।
सजे सुहागन तभी,
माँग भर जब हो कुमकुम।
🙏अटल राम चतुर्वेदी🙏
[16/12 6:25 PM] सरला सिंह:
मां शारदे को नमन करते हुए
विषय पर एक लघु प्रयास----

दिनांक-16.12.19
दिन-सोमवार
विधा- कुण्डलिया
विषय-वेणी

वेणी बालों में सजी, सजी महावर पांव,
आंखों में कजरा लगा,चली पिया के गांव।
चली पिया के गांव,बजी मन में शहनाई।
बड़ी शुभघड़ी आज, मिलन की वेला आई।
कहती सरला बात , लगी घबराने गृहिणी।
लाल लाज से गाल, लगी खुलने जी वेणी।

डॉ सरला सिंह स्निग्धा
दिल्ली

दिनांक-16.12.19
दिन-सोमवार
विधा- कुण्डलिया
विषय-कुमकुम

 कुमकुम है माथे सजी, गाल पर है लाली,
 अंखियन में कजरा सजे, लगे भागों वाली।
 लगे भागों वाली,सजी द्वार पे रंगोली ।
 आंखों से हो बात ,करें सब हंसी ठिठोली।
कहती सरला आज, लगे कुछ गोरी गुमसुम।
पायल करे अवाज,दिखे मनभावन कुमकुम।।

डॉ सरला सिंह स्निग्धा
दिल्ली
[16/12 6:25 PM] सरोज दुबे: कुमकुम --16-12-19

टीका कुमकुम की प्रथा, सदियों से ये रीत
कन्या को देवी समझ ,
रखें सदा ही प्रीत l
रखें सदा ही प्रीत, सभी के माथे सजता l
कहें शुभ का प्रतीक,
ईश ललाट में लगताl
कहती सुनो सरोज,
नहीं ये पड़ता फीका l
पूजा थाली संग, दिखे ही कुमकुम टीका ll

सरोज दुबे
🙏🙏
[16/12 6:26 PM] सरोज दुबे: वेणी --16-12-19

सजती वेणी से सदा
दुल्हन की है शान  ,
 बालों की शोभा बढ़े,
नारी की पहचान ll
नारी की पहचान,
खड़ी बालम को ताके
बनके सुन्दर नार,
केश में फूल  लगाकेll
कहती सुनो सरोज, सदा मंजुल सी लगतीl
नारी का श्रृंगार, 
 यही वेणी जब  सजती l

सरोज दुबे
🙏🙏
[16/12 6:27 PM] प्रतिभा प्रसाद: --- *कुंडलियाँ*
दिनांक ---- 16.12.19.....
विषय -----  *कुमकुम*

कुमकुम चिन्ह सुहाग है , यूँ शोभित लीलार ।
नारी भी सुंदर दिखे , आवे रुप ‌पे प्यार ‌।
आवे रुप पे प्यार , है सजना को रिझाना ।
छिड़कते नेह धार , कभी मन को समझाना ।
कह कुमकुम कविराय , रहना पड़ता न गुमसुम ।
दुलार की हो बात , पकड़ा देत हैं कुमकुम ।।


🌹 *प्रतिभा प्रसाद कुमकुम*
        दिनांक   16.12.19.....

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[16/12 6:46 PM] अनंत पुरोहित: दिन - सोमवार 16.12.2019
विषय: वेणी, कुमकुम
विधा कुण्डलियाँ

1)
वेणी से नारी सजे, यह उसका श्रृंगार
सिर वेणी के बिन रहे, आधी ही हर नार
आधी ही हर नार, यही उसकी है शोभा
प्रेमी को ले खींच, माथ से निकली
आभा
कह अनंत कविराय, केश धर रूप सर्पिणी
प्रेमी का हिय मोह, सर्प सी लहरे वेणी

2)
कुमकुम से है शोभता, नारी तेरा माथ
बिनु कुमकुम टीका बिना, तेरी दशा अनाथ
तेरी दशा अनाथ, चिह्न सौभाग्य तिलक का
पति के मन को भाय, हेतु प्राणेश पुलक का
कह अनंत कविराय, चिह्न यह मत छोड़ो तुम
देशी यह संस्कार, माथ की शोभा कुमकुम

अनंत पुरोहित
सादर समीक्षार्थ
[16/12 6:48 PM] बोधन राम विनायक: कुण्डलियाँ लेखन-
दिनाँक - 16.12.19
दिन - सोमवार

*विषय - वेणी*

नारी  वेणी  से  सजे, पावन  है  श्रृंगार।
बाल कटाने की प्रथा, बंद करे संसार।।
बंद करे संसार,धर्म नहिँ  बाल कटाना।
नारी शोभित केश,रूप को सब है जाना।।
कहे विनायक राज,आज मत हो लाचारी।
गूँथे  वेणी  रोज, दिखे  सुंदरता  नारी।।

*विषय - कुमकुम*

कुमकुम रोली साथ में,सुन्दर लागे भाल।
नारी की है साज ये, छम्मक छल्लो चाल।।
छम्मक छल्लो चाल,देखते मन को भाती।
कुमकुम लाली माथ,नाज नखरा छलकाती।।
कहे विनायक राज,सजाना नारी को तुम।
स्वर्ग परी सी मान,लगे जब माथे कुमकुम।।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
बोधन राम निषादराज"विनायक"
सहसपुर लोहारा,जिला-कबीरधाम(छ.ग.)
[16/12 6:48 PM] रजनी रामदेव: (1)-वेणी
सखियाँ वेणी गूँथकर, करने लगीं शृंगार।
साजन अब बारात ले, आवो मेरे द्वार।।
आवो मेरे द्वार, मिलन की बेला आई।
द्वार चार की रीत, निभावें बाबुल भाई।।शहनाई की गूँज, सुनत भइ व्याकुल अखियाँ।
व्याकुलता को देख,छेड़ती मुझको सखियाँ।।

(2)-कुमकुम
चंदन कुमकुम आरती, बहन सजाती थाल।
भाई चिरायु हो सदा, टीका करती भाल।।
टीका करती भाल, विदा करती है सरहद।
भारत माँ के लाल , हिया करते हैं गदगद।।
प्रभु देना आशीष, जोड़ 'कर' करती वंदन।
अरि को देना मात, लगाती कुमकुम चंदन।।
                रजनी रामदेव
                   न्यू दिल्ली
[16/12 6:49 PM] केवरा यदु मीरा: कुंडलिया छंद

वेणी में गजरा सजा, गोरी सज धज आय ।
देख रहे हैं साजना, मंद मंद मुस्काय ।
मंद मंद मुस्काय, गोरिया है इतराती ।
चूड़ी कंगना हाथ, सजनिया है खनकाती ।
कहती मीरा आज, बड़ी प्यारी सी गृहणी ।
लगती परी समान, सजा कर गजरा वेणी ।।

केवरा यदु "मीरा "
राजिम
[16/12 6:55 PM] घनेश्वरी देवांगन 'धरा': *कलम की सुगंध छंदशाला*

*कुण्डलियाँ शतकवीर हेतु*

*दिनांक - 16.12.19*

*कुण्डलियाँ (1)*

*विषय----------वेणी*

काली वेणी कामिनी,  चलती नागिन चाल ।
अपलक रूप निहारते , मोहन हुये निहाल ।।
मोहन हुये निहाल  ,  नैन देख के कजरिया ।
प्रभा मयी मुख ओज , लचकती जाय कमरिया ।।
मटक-मटक बल खाय ,झूमती जैसे डाली ।
भीनी सुरभित पुष्प ,सुसज्जित वेणी काली ।।


*कुण्डलियाँ (2)*

*विषय-----------कुमकुम*

बिटिया कुमकुम माथ की,दमके विश्व विशाल ।
धीरज धर के धारिणी ,करे जगत खुशहाल ।।
करे जगत खुशहाल ,  रहे नर पर वह भारी ।
ईश्वर का वरदान , सभ्य सौम्या संस्कारी  ।।
चहके आँगन द्वार , निराली माँ की चिङ़िया ।
करे धरा ये प्रश्न , परायी क्यूँ हैं बिटिया ?।


*रचनाकार का नाम--*

*धनेश्वरी देवांगन धरा*
*रायगढ़, छत्तीसगढ़*
[16/12 7:03 PM] केवरा यदु मीरा: कुंडलिया छंद

कुमकुम माथे पर लगा,रचा महावर लाल ।
चलती है गजगामिनी,है मतवाली चाल ।
है मतवाली चाल, पिया के मन को भाती
करती नखरा नाज, जरा भी नहिं शरमाती।
कहते साजन आज, सजनिया प्यारी हो तुम ।
मेरे नाम की तुम, लगाती हो जी कुमकुम ।।

केवरा यदु"मीरा "
राजिम
[16/12 7:06 PM] आदेश कुमार गुप्ता पंकज: कुण्डलियाँ शतक वीर कलम की सुगंध सम्मान -2019
दिनाँक *** 16/12/2019
आज की कुण्डलियाँ * वेणी
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वेणी गूँथी जतन से ,और लगाया फूल ।
मदमाती है झूमती ,बोले ऊल जलूल ।।
बोले ऊल जलूल ,शर्म नहिं आती उसको ।
नहीं रही है लाज ,बोलती उल्टा सबको ।।
करके गड़बड़ कृत्य ,गिराये अपनी श्रेणी ।
करती फिरती नाज ,बना के वो है वेणी ।।
***********************************
कुम कुम
**********************************
कुमकुम माथे पे सजा ,करे सुशोभित भाल ।
लगे प्रफुल्लित नार अब ,चमक रहें हैं गाल ।।
चमक रहेंं हैं गाल ,खुशी से नित्य झूमती ।
फूली नहीं समाय ,इधर से उधर घूमती ।।
कह पंकज कविराज ,पिया हर्षाय हर दम ।
महिला बारम्बार ,लगाती अपने कुम कुम ।।
***********************************
डाँ. आदेश कुमार पंकज
[16/12 7:06 PM] अनुराधा चौहाण मुम्बई: कलम की सुगंध छंदशाला

कुण्डलियाँ शतकवीर हेतु

दिनांक - 16.12.19

कुण्डलियाँ (1)
विषय-वेणी
_________________________
महकी वेणी मोगरा,जूड़े सजती आज।
शरमाती गोरी चली,पायल देती साज।
पायल देती साज,पहन के कँगना हाथों।
भाँवर पड़ती आज,रही ले फेरे सातों।
कहती अनु सुन आज,खुशी से दुल्हन चहकी  ।
लाली मुख पे  लाल,लटों में वेणी महकी।

कुण्डलियाँ (2)
विषय-कुमकुम

गोरी बैठी पालकी,चली पिया के देस।
आँखों में कजरा लगा,पहने चूनर वेस।
पहने चूनर वेस,चमका माँग का टीका,
गजरा महका बाल,लगाए कुमकुम टीका।
छोटी थी कल देख,लली थी सुनती लोरी
चलदी वो ससुराल,विदा होकर के गोरी।

रचनाकार का नाम-अनुराधा चौहान
[16/12 7:16 PM] अभिलाषा चौहान: कलम की सुगंध छंदशाला
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कुण्डलियां शतकवीर हेतु
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दिनांक-१६/१२/२०१९

कुण्डलियाँ    (1)
विषय - वेणी
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वेणी गजरे से सजी, चंचल सी मुस्कान।

कान्हा के उर में बसी,गोकुल की है शान।

गोकुल की है शान,सभी के मन को मोहे।

जैसे हीरक हार,रूप राधा का सोहे।

कहती 'अभि' निज बात,प्रेम की बहे त्रिवेणी।

दीप शिखा सी देह ,सजा के सुंदर वेणी।

कुण्डलियाँ (2)
विषय - कुमकुम

कुमकुम जैसी लालिमा,बिखरी है चहुं ओर।

जग जीवन चंचल हुआ,हुई सुनहरी भोर।

हुई सुनहरी भोर,सजे हैं बाग बगीचे।

जाग उठे खग वृंद,कौन अब आंखें मीचे।

कहती 'अभि' निज बात,रहो मत अब तुम गुमसुम।

सुखद नवेली भोर ,धरा पर बिखरा कुमकुम।

अभिलाषा चौहान
सादर समीक्षार्थ 🙏🌷
[16/12 7:25 PM] तोषन: ●●●●●कलम की सुगंध छंदशाला●●●●●
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            कुण्डलियाँ शतकवीर हेतु
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              दिनांक - 16.12.19
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              कुण्डलियाँ (1)
                विषय-वेणी

लाती मन मुस्कान ये,देख अजब श्रृंगार।।
वेणी है अभिन्न अंग,शोभित होती नार।
शोभित होती नार,खिले गजरा इठलाती।
मन को भाती साज,रूप यौवन मधुमाती।।
कह तोषन कविराज,शाम या पवन प्रभाती।
वेणी कैसी साज,सोच है हिय मे लाती ।।
★★★★★★★★★★★★★★★★
              कुण्डलियाँ (2)
              विषय-कुमकुम

कुमकुम से ही शान है,माने नारी आज।
शोभित नारी जिंदगी,नारी का है ताज।।
नारी का है ताज,मान है जग में पाता।
रहे सदा जो साथ,बलम से निर्मल नाता।।
कह तोषन कविराज,रहो कभी नहीं गुमसुम।
हे भारत की नार,माँथ सिरजाओ कुमकुम।।
★★★★★★★★★★★★★★★★
             रचनाकार का नाम
      तोषण कुमार चुरेन्द्र धनगंइहा
    डौंडी लोहारा बालोद, छत्तीसगढ़
[16/12 7:28 PM] विद्या भूषण मिश्र "ज़फ़र": **कुंडलिया शतकवीर प्रतियोगिता*
*सोमवार-- १६/१२/१९*
*१--वेणी--*
~~~~~~~~~~~~~~
सिंदूरी आभा लिए,  रक्तिम-कमल-कपाल।
वेणी नागिन के सदृश, माथे बिंदी लाल।
माथे बिंदी लाल,आँख में काजल सोहे।
मादक अधर अनूप, देख मानव मन मोहे।
कंचन वर्ण शरीर, परी सी लगती पूरी।
नर नारी सब मुग्ध, देख आभा सिंदूरी।।
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*२--कुमकुम--*
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रोली, कुमकुम भाल पर, माँग भरे सिंदूर।
कंचन वर्ण शरीर पर, आभूषण भरपूर।
आभूषण भरपूर, पहन कर लेती फेरे।
पति गृह बेटी जाय , सभी परिजन हैं घेरे।
बाबुल का घर छोड़ ,उठी बेटी की डोली।
दम दम दमके रूप, भाल पर चमके रोली।।
~~~~~~~~~~~~~
*--- विद्या भूषण मिश्र "भूषण", बलिया, उत्तरप्रदेश।*

*सादर समीक्षार्थ एवं चयन हेतु🙏🏻🙏🏻*
[16/12 7:29 PM] पुष्पा विकास गुप्ता कटनी म. प्र: कलम की सुगंध छंदशाला

कुण्डलियाँ शतकवीर हेतु

दिनांक - 16.12.19

कुण्डलियाँ (1)

विषय- *वेणी*

सुंदर वेणी बाँध के, लेती केश सँवार।
गोरी तेरे रूप पर, साजन हैं बलिहार।।
साजन हैं बलिहार, चाल चलती मदमाती।
यह रेशम सी डोर, कमर तक तब लहराती।।
लटके इक लट माथ, झूमती गालों ऊपर।
गोरी लगे कमाल, बाँध के वेणी सुंदर ।।


कुण्डलियाँ (2)

विषय- *कुमकुम*

कुमकुम लगती माथ जब, पूरा हो शृंगार।
बढ़ जाता सौन्दर्य है, जैसे गुणित हजार।।
जैसे गुणित हजार, रूप है और निखरता।
जैसे नभ पे चाँद, हृदय को शीतल करता।।
ले हाथों में हाथ, संग ज्यों चलते हमतुम।
देती प्यार मिठास, भाल पर सजती कुमकुम ।।



रचनाकार का नाम- पुष्पा गुप्ता "प्रांजलि"
[16/12 7:32 PM] चमेली कुर्रे: कलम की सुगंध छंदशाला

*कुण्डलिया शतकवीर हेतु*


दिनांक-  16/12/19

कुण्डलियाँ-: (1)
विषय -  *वेणी*
         
लचके जब बाली कमर, वेणी होय निहाल।
दिल पर करती वार है, चलती हिरनी चाल।।
चलती हिरनी चाल, अंग पर हल्के झटके ।
करे नयन से कैद, रहे क्षण भर हिय अटके ।।
सुवासिता तुम आज, नजर से रहना बचके ।
भँवरे हों बेचैन, कमर जब देती लचके।।

कुण्डलियाँ -: (२)
  विषय- *कुमकुम*

देखा कुमकुम का तिलक ,वीर सिपाही भाल।
शस्त्र उठा आगे बढा , वो कालो का काल।।
वो कालो का काल, बहुत ही चौडा सीना ।
हाथ लिए तलवार, शत्रु का छुटे  पसीना ।।
सुवासिता तुम आज, मिटा दो बंधन रेखा ।
शौर्य वंश का लाल, नही है इन सा देखा ।।

🙏🙏🙏
✍चमेली कुर्रे 'सुवासिता'
जगदलपुर (छत्तीसगढ़)
[16/12 7:38 PM] शिवकुमारी शिवहरे: वेणी
वेणी फूलों से सजी, करने लगी श्रृंगार।
लाल चुनरिया ओढ़ ली,चली पिया के द्वार।
चली पिया के द्वार,  उठी है घर से डोली।
छूट गया घर बार,  सभी छूटी  हमजोली।
कर सोलह श्रृंगार, लगे है कितनी सोणी।
 पहना गले मे हार, लगी है सुंदर वेणी।

   ..शिवकुमारी शिवहरे
[16/12 7:47 PM] डा. कमल वर्मा: कुंडलियाँ।
विषय_🌹वेणी🌹

काली वेणी साप सी,कमर बीच लटकाय।
झूले जैसे नाग हों,दिल में लिपटी जाय।
दिल में लिपटी जाय,मुझे करती दीवाना।
रुन झुन चलती नार,नैन में तूं बस जाना।
कहे कमल ये केश, नार  का सुख है आली।
सुंदर पहनी वेश,सजे है वेणी काली।
डॉ श्रीमती कमल वर्मा
[16/12 7:52 PM] बाबूलाल शर्मा बौहरा: 👀👀👀👀👀👀👀👀👀👀
~~~~~~~~~~~~~बाबूलालशर्मा
*कलम की सुगंध छंदशाला*
(कुण्डलिया शतकवीर हेतु)
दिनांक..  16.12.2019


कुण्डलिया १
विषय.. वेणी

मिलती  संगम में  सरित, कहें  त्रिवेणी धाम!
तीन  भाग  कर  गूँथ लें, कुंतल  वेणी  बाम!
कुंतल   वेणी   बाम, सजाए   नारि  सयानी!
नागिन  सी  लहराय, देख  मन चले जवानी!
कहे लाल  कविराय, नारि  इठलाती  चलती!
कटि पर वेणी साज, धरा पर सरिता मिलती!

कुण्डलिया २
विषय... कुमकुम

माता   पूजित  भारती , अपना  हिन्दुस्तान!
समर क्षेत्र पूजित सभी, उनको तीरथ मान!
उनको तीरथ  मान, देश हित शीश चढ़ाया!
धरा रंग  कर लाल, मात  का  मान बढ़ाया!
शर्मा  बाबू लाल , भाल पर तिलक लगाता!
रजकण कुमकुम मान, पूजता भारत माता!

✍,©
बाबू लाल शर्मा,बौहरा
सिकंदरा,दौसा, राजस्थान
👀👀👀👀👀👀👀👀👀👀
[16/12 7:54 PM] सुकमोती चौहान: कुंडलियाँ
2)कुमकुम।
लाली कुमकुम की सदा,चमकें मेरे माथ।
दो मुझको आशीष माँ,सिर पर रखकर हाथ।       

सिर पर रख कर हाथ,साथ यह कभी न छूटें।
सत्य यही वरदान,बचे सब सपने खोटे।
 कहें कमल कर जोड़,बनूं मैं भाग्यों वाली।
भर दो झोली मात,रहें कुमकुम की लाली।
 डॉ श्रीमती कमल वर्मा
[16/12 8:00 PM] सुकमोती चौहान रुचि: कुण्डलियाँ


            1 .  *वेणी*

गंगे उतरी स्वर्ग से,पवन वेग की धार।
शिव वेणी से रोकते,धरे वृहद आकार।
धरे वृहद आकार,हलाहल पीये ऐसे।
छोटे छोटे बाल,दूध पीते हैं जैसे।
कहती रुचि करजोड़,भभूती जिनके अंगे।
नमन करूँ शत् बार,जटाधारी जय गंगे।


                2  *कुमकुम*

गौरी पूजन के लिए,चली जानकी माय।
चुनरी कुमकुम चूड़ियाँ,सीता मातु चढ़ाय।
सीता मातु चढ़ाय,बसाये मन में रामा।
माँग रही वरदान,होय पूरण मन कामा।
कहती रुचि करजोड़,शीश पर सोहै मौरी।
राम सीय का लग्न,पधारे गौरा गौरी।


✍सुकमोती चौहान "रुचि"
बिछिया,महासमुन्द,छ.ग.
[16/12 8:14 PM] डॉ मीना कौशल: वेणी सोहै शीश पर ,सुमुखि सुलोचनि नारि।
मुखमण्डल आभा सुखद,लालन वंदन निहारि।।
लालन वंदन निहारि, सदा सुख शोभित नारी।
सबके सुख में सुखी,रहे नारी बेचारी।।
गंगा यमुना सरस्वती,है अक्षि त्रिवेणी।
शोभा निरखि निहाल,सुखद कटि तट है वेणी।।



कुमकुम छवि मस्तक सजे,भाग्यवती पहचान।
पूजा में रोली परम,सुखदायक गुणगान।सुखदायक गुणगान ,ध्यान चन्दन शुभ वंदन।
खुश होते भगवान ,श्रीहरि यशुदानन्दन।।
अक्षत रोली बिन्दु सुखद,है सुखमय संगम।
माथे पर से सदा,सुवासित रोती कुमकुम।।
डा‌‌ मीना कौशल
[16/12 8:24 PM] संतोष कुमार प्रजापति: कलम की सुगंध छंदशाला

कुण्डलियाँ शतकवीर हेतु

दिनांक - 16.12.19

कुण्डलिया(1)
विषय- वेणी
==========

जैसे   वेणी  को   लखा, नाच  उठा   मन  मोर I
सुमन सुगन्धित भा रहे, अनुपम पिय चितचोर Il
अनुपम  पिय  चितचोर, निखारा  रूप सलोना l
लहराती   कटि   पास, लगे   मत   जादू  टोना ll
कह    'माधव   कविराय', बचेगा  कोई     कैसे l
दर्शक   सब   बेहाल, किया  हो   मोहित  जैसे Il

कुण्डलिया (2)
विषय- कुमकुम
============

कुमकुम मस्तक में लगा, सुन्दर सुभग निशान l
बाबा     बनकर     घूमते, माँगें  दाल  पिसान ll
माँगे    दाल   पिसान, नहीं   खाते  हैं  इसको l
बेंचें  किसी दुकान, भला मालुम मत किसको ll
कह 'माधव कविराय', रहोगे कब तक गुमसुम I
धूल  झोंकते  आँख, लगा मस्तक में कुमकुम Il

रचनाकार का नाम-
      सन्तोष कुमार प्रजापति 'माधव'
                  महोबा (उ.प्र.)
[16/12 8:26 PM] डॉ मीता अग्रवाल: कुंड़लिया शतकवीर हेतु सादर

 *कुंड़लिया छंद-(1)वेणी*

चुनरी सरकत शीश से,बिखरत सर के बाल।
वेणी को धर खींचता,नटखट चंचल  लाल।
नटखट  चंचल लाल,लाल की हँसी  ठिठोली ।
तुतले तुतले बोल,निहारें माता भोली।
कहती मधुर विचार,तोतरी वाणी सुनरी।
लेत बलैया मात,सवाँरी सरकत चुनरी।

         *(2)कुमकुम*

लाली कुमकुम है सदा,तिय माथे की साज।
रंगत बाढ़े सौ गुना,बाढ़े मुख पे लाज।
बाढ़े मुख पे लाज,पिया को लागे प्यारी।
नारी का श्रृंगार, लगाये बेंदी न्यारी।
कहे मधुर मति मंद,सुहागन भागों  वाली।
अटल रहे सौभाग्य, माँग की कुमकुम  लाली।

मीता अग्रवाल मधुर रायपुर छत्तीसगढ़
सादर समीक्षार्थ
[16/12 8:43 PM] अनुपमा अग्रवाल: कलम की सुगंध छंदशाला

कुण्डलियाँ शतकवीर हेतु

दिनांक - 16.12.19

कुण्डलियाँ (1)
विषय- वेणी



गेसू में वेणी सजे, हाथों में हथफूल।
गल बिच सोहे नौलखा,कोई चुभे न शूल।
कोई चुभे न शूल,कि लाडो तू खुश रहना।
देती ये आशीष,यही है मेरा कहना। 
कहती अनु ये आज,सजे सिर वेणी टेसू।
रूप सलोना खूब, सजे वेणी से गेसू।।


कुण्डलियाँ (2)
विषय- कुमकुम


कुमकुम टीका माँग में,गल बिच नौसर हार।
रुनझुन पायलिया बजे,भोली भाली नार।
भोली भाली नार, हमारे मन है भाई।
रखती सबका ध्यान,बहू जबसे घर आई। 
कहती अनु ये आज,लगे मुख कितना नीका 
कुलवधु गुण की खान,सजे ये कुमकुम टीका



रचनाकार का नाम- अनुपमा अग्रवाल
[16/12 8:45 PM] यशवंत यश सूर्यवंशी भिलाई दुर्ग छग: कलम की सुगंध छंदशाला

कुण्डलियाँ शतकवीर हेतु

दिनांक - 16.12.19

कुण्डलियाँ (1)
विषय- वेणी

बालों में वेणी सजी,दुल्हन कर श्रृंगार ।
चकवा चंदा ताकते,पिया मिलन दीदार ।।
पिया मिलन दीदार, फूल मत मुरझा जाए।
बिखरे खुश्बू पुष्प, चहुँओर फिर महका जाए।।
कहे सूर्य यशवंत, दमकते गुलाब गालों।
भौंरे भ्रमणे भोर,शीश पर वेणी बालों।।



कुण्डलियाँ (2)
विषय- कुमकुम

मस्तक कुमकुम है सजा,शादी की पहचान ।
सुना पड़ा है माथ जो,कन्या विधवा मान।।
कन्या विधवा मान,सदा अरमान सजाये ।
मिटने कुमकुम मांग ,नारी सदैव बचाये ।।
कहे सूर्य यशवंत, कलम में स्याही दस्तक ।।
ब्याही नारी भाल,सजी है कुमकुम मस्तक।।





रचनाकार का नाम-
[16/12 8:48 PM] आशा शुक्ला: कलम की सुगंध छंदशाला

कुण्डलियाँ शतकवीर हेतु

दिनांक-16:12:19

कुण्डलिया (1)
विषय- वेणी



गूँथी वेणी नार ने, सेंदुर लिया लगाय। माथे पर बेंदी सजी, रूप निखर रह जाए।
रूप निखर रह जाए,  सजे हैं सुंदर गहने।
झिलमिल झिलमिल होय,नार साड़ी जो पहने।
रूप न बरनो जाय, सजी मुस्कान अनूठी।
जिया ले गई खींच,गजब की वेणी गूँथी।



कुण्डलिया (2)
विषय- कुमकुम


नारी का श्रृंगार है, ये कुमकुम अनमोल।
सब सज्जा फीकी पड़े,रूप तराजू  तोल।
रूप तराजू तोल, पिया की यही निशानी।
सजा लिया ये माथ, बनी राजा की रानी।
उड़ी अधर से हँसी ,करे क्या पायल  भारी।
लगे अधूरा रूप, बिना प्रियतम के नारी।



रचनाकार का नाम-आशा शुक्ला
[16/12 8:59 PM] प्रतिभा प्रसाद: *कुंडलियाँ*

विषय  *वेणी*
दिनांक  16.12.19......

(01)              *वेणी*

वेणी नागिन सी लगे , भुइयां लोटे केस ।
कान्हा का मन‌ बावरा , धरे राधा का भेस ।
धरे राधा का भेस , मिलेंगी राधा रानी ।
चतुराई व दर्शन ,  कान्हा भरेंगे पानी ।
कह कुमकुम करजोरि , राधा से नेह है लेनी ।
माधव की है प्रीत , खिचे राधा की ‌वेणी ।।



(02)             *कुमकुम*

कुमकुम चिन्ह सुहाग है , ज्यों शोभित लीलार ।
नारी भी सुंदर दिखे , रुप ‌पे आवै प्यार ‌।
रुप पे आवै प्यार , है सजना को रिझाना ।
छिड़कते नेह स्नेह , कभी मन को समझाना ।
कह कुमकुम कविराय , रहना पड़े हाँ गुमसुम ।
हो पावन पुण्य प्रीत  , पकड़ा देत हैं कुमकुम ।।


🌹 *प्रतिभा प्रसाद कुमकुम*
        दिनांक   16.12.19.....

___________________________________
[16/12 9:02 PM] कन्हैया लाल श्रीवास: 🙏प्रथम प्रयास🙏
कुंडलीयाँ .............वेणी
★★★★★★★★★★★★★★★★★
वेणी सुंदर लग रही,नारी का श्रृंगार।
उसकी शोभा जब बढे,गूँथे फूलों हार।
गूँथे फूलो हार,लगती कितनी मनोहर।
लहराये कमर पर,बनती किसकी सहोदर।
नारी श्रृंगार कर,लगी मूरत की मंदर।
सोलह श्रृंगार कर,लग रही वेणी सुंदर।
★★★★★★★★★★★★★★★★★★★
स्वलिखित
कन्हैया लाल श्रीवास
भाटापारा छ.ग.
[16/12 9:07 PM] राधा तिवारी खटीमा: कलम की सुगंध छंदशाला

कुण्डलियाँ शतकवीर हेतु एक प्रयास

दिनांक - 16.12.19

कुण्डलियाँ (1)
विषय- वेणी

वेणी प्यारी सी बने, यदि हो लंबे बाल।
 नागिन जैसी लग रही, गोरी की तो चाल।।
 गोरी की तो चाल, लगे हैं सबको प्यारी।
 रानी बनकर राज, करे हर घर में नारी ।
कह राधे गोपाल, प्रथम नारी की श्रेणी।
 नारी की है शान, बनी बालों की वेणी।


कुंडलीयाँ  (2)
विषय- कुमकुम

 कुमकुम भर के माँग में, नार करे श्रृंगार ।
फेरे लेकर सात वो, आती पिय के द्वार।
 आती पिय के द्वार, विदाई करती माता।
 वर जी आए द्वार, बदलता भाई छाता।।
 कह राधे गोपाल, पिता जी क्यों है गुमसुम।
 नारी का श्रृंगार, सदा से ही है कुमकुम।


रचनाकार का नाम-राधा तिवारी "राधेगोपाल"
खटीमा उधम सिंह नगर
उत्तराखंड
[16/12 9:07 PM] इंद्राणी साहू साँची: कलम की सुगंध छंदशाला

कुण्डलियाँ शतकवीर हेतु

दिनांक - 16.12.19
कुण्डलिया (1)
विषय - वेणी
***************************
रानी माँ को भा रही ,
                अद्भुत मुक्ताहार ।
सुरभित फूलों से हुई ,
                 वेणी का श्रृंगार ।
वेणी का श्रृंगार ,
         सजे है लाली कुमकुम ।
कंगन बिंदी खूब ,
          बजे है पायल छुमछुम ।
भक्त करे मनुहार ,
                रीझती है वरदानी ।
देती है आशीष ,
                हमारी माता रानी ।।

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कुण्डलियाँ (2)
विषय - कुमकुम
***************************
कुमकुम हल्दी से सजी ,
             बनी सुहागन नार ।
भाग्य चिन्ह यह पाय के ,
         खुशियाँ मिली अपार ।
खुशियाँ मिली अपार ,
          यही है उसका गहना ।
सुख दुख जो भी आय ,
       साथ प्रियतम के सहना ।
जन्म मरण का संग ,
          कहे ये पायल छुमछुम ।
हर नारी की आस ,
       यही हल्दी अरु कुमकुम ।।
*********************************
✍️इन्द्राणी साहू"साँची"✍️
     भाटापारा( छत्तीसगढ़)
★★★★★★★★★★★★★★
[16/12 9:17 PM] कमल: नमन
कुंडलियॉ
16.12.2019

1-वेणी

कजरारी वेणी गुॅथी,लगती नागिन काल।
नाग देवता खोजती,हो -हो हिया निहाल।
हो-हो हिया निहाल,मिलन को अँखियॉ तरसें।
ताल तलैया एक,नेह की नदियॉ बरसें।
कहे कमल कविराज,सजन की सजना प्यारी।
हर पल रहती साथ,लिए वेणी कजरारी।

2-कुमकुम

कुमकुम बिंदी माथ पर,सोहे गजरा बाल।
ओंठ गुलाबी खुल गये,साजन भये निहाल।
साजन भये निहाल,गोद में हाल उठाया।
लूट लिया श्रृंगार,सुहागन को है भाया।
कहे कमल कविराज,जगी मदहोशी निंदी।
सजनी का सौभाग्य,सजी जो कुमकुम बिंदी।

कवि-कमल किशोर "कमल"
        हमीरपुर बुन्देलखण्ड।
        16.12.2019.
🌹👏🌹🌹👏🌹🌹




वेणी 53
[16/12 9:18 PM] आरती श्रीवास्तव: कुमकुम सजी है माथे पर,केशु लटके मुख नार
बाबुल के घर छोड़ चली,पिया मिलन की आस।
पिता मिलन की आस,देखो शुभ घड़ी आई।
माँ-बाप कहते यही,बेटी हुई पराई।
खुशहाल रहे सदा ये, दुःख में रहे न गुम।
सदा सुहागन ये रहे,रहे माथे कुमकुम।

सादर समीक्षार्थ-आरती श्रीवास्तव


[16/12 9:41 PM] रवि रश्मि अनुभूति:

  कुण्डलिया छंद
÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷
1 ) वेणी ---
**********
वेणी बालों की सजी , बिंदिया सजती माथ ।
नथनी सजती नाक में , शोभित कुंडल साथ ।।
शोभित कुंडल साथ , रूप दिखता है प्यारा ।
रूप तो अब सुहाय , निखरे श्रृंगार न्यारा ।।
लगती देखो आज , दुल्हन की उच्च श्रेणी ।
उसकी है यह लाज , सजी बालों की वाणी ।।


कुण्डलिया छंद ---
*****************
2 ) कुमकुम ---
**************
नारी सुंदर ही दिखे , कुमकुम दिखे लगाय ।
रूप सुहाना ही सजे , नारी निरखत जाय ।।
नारी निरखत जाय , रूप सिंगार है भाता ।
कोरा लगता माथ , जब तक न यह लग जाता ।।
लगती खिलती नार , सुहाग की प्रीत  प्यारी ।
कुमकुम माथे धार , दिखे ही सुंदर नारी ।।

(C) रवि रश्मि 'अनुभूति '
मुंबई ( महाराष्ट्र )
16.12.2019 , 7:50 पीएम पर रचित ।
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[16/12 9:41 PM] गीतांजलि अनकही: सादर समीक्षार्थ
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आज की कुण्डलिया
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*वेणी*

सागर के तट रुक्मिणी, जोह रही प्रभु की बाट।
स्वर्ण कली की खोज में, गए द्वारिका हाट॥
गए द्वारिका हाट, गिरीधर नागर नटवर।
रानी का सिंगार, करना आज है निज कर॥
वेणी कलियाँ गूँथ, करेंगे नेह उजागर।
सके न कोई रोक, प्रेम प्रबल का सागर॥
==================
*कुमकुम*

कुमकुम भर कर माँग में, चली सुहागन नार।
साजन का मन मोहने, कर सोलह सिंगार॥
कर सोलह सिंगार, वसन आभूषण नव चुन।
अंग अंग में प्रीत, सपने सुंदर नयन बुन॥
धर कर मन में धीर, जाना कहती सखी सुन।
कहे अनकही बात, माँग तेरी का कुमकुम॥
==================
गीतांजलि ‘अनकही’
[16/12 9:44 PM] महेंद्र कुमार बघेल: कुण्डलियाॅ:-

*वेणी*

नदियों का संगम जहां, वह वेणी कहलाय।
वह निर्मल जल धार ही , सबकी प्यास बुझाय।
सबकी प्यास बुझाय, वही है आज प्रदूषित।
सब कुछ है प्रत्यक्ष, समस्या ये अनुसूचित।
रखना होगा स्वच्छ, सदा जल धार विहंगम।
प्रकृति रहे अक्षुण्ण, जहां होता है संगम।।

*कुमकुम*

कुमकुम है गहना तिलक, इसका गजब महत्व।
उर्जित करने माथ को,इसमें संचित तत्व।
इसमें संचित तत्व,तंतुकी पुष्ट बनाते।
भरने अपनी मांग, सुहागन सब अपनाते।
खिले रूप सौंदर्य, सुघड़ दिखतीं मां बहना।
सजती रहे कपाल,तिलक  कुमकुम है गहना।।
महेंद्र कुमार बघेल

[16/12 9:55 PM] अमित साहू: *कुण्डिलयाँ शतकवीर*
दिनाँक 16/12/2019
1- वेणी (चोटी)
बिखरे वेणी यूँ लगे, घिरे घटा घनघोर।
निहारता अपलक पिया, जैसे चंद चकोर।।
जैसे चंद चकोर, देख सजना बौराता।
हृदय समाकर रूप, प्रेम का दीप जलाता।।
सजन भरे जब बाँह, तभी तो सजनी निखरे।
नागिन सी बलखाय, वेणिका जब-जब बिखरे।।
2-कुमकुम
पूरी होती कामना, शुभ फल मिले हजार।
सदा सुहागन चाहती, सोलह मन श्रृंगार।।
सोलह मन श्रृंगार, बिंदिया कुमकुम गहनें।
चूड़ी कंगन हार, सुशोभित सबकुछ पहनें।।
कहे 'अमित' कविराज, प्रीति बिन नार अधूरी।
चुटकी भर सिंदूर, कामना करती पूरी।।
कन्हैया साहू 'अमित'
भाटापारा छत्तीसगढ़

[16/12 9:56 PM] नीतू ठाकुर: *कलम की सुगंध छंदशाला*

*कुण्डलियाँ शतकवीर हेतु*

*दिनांक - 16.12.19*

*कुण्डलियाँ (1)*
*विषय :- वेणी*

ओढ़े घूँघट लाज का , कर सोलह श्रृंगार।
बालों में वेणी सजा, चली ठुमकती नार।।
चली ठुमकती नार, लगे है सबसे हटके।
देख गजब की चाल, बाँवरा मन ये भटके।।
चंद्रमुखी सा रूप, बांध हिय का जब तोड़े।
ताकें नयन हजार, मौन की चादर ओढ़े।।

*कुण्डलियाँ (2)*
*विषय :- कुमकुम*

कुमकुम सजते मांग में,बदले भाग्य लकीर।
सावित्री की भूमिका, निभा रही है हीर।।
निभा रही है हीर, गली में रांझा भटके।
पकड़ा जाए रोज, पुलिस के खाये फटके।।
ऐसे फूटे भाग्य, न बाजे पायल छुमछुम।
बहे नयन से नीर, लगाया जब से कुमकुम।।

*रचनाकार का नाम :- नीतू ठाकुर*

Saturday, 14 December 2019

मानवीकरण अलंकार वर्कशॉप

शीर्षक :- मानवीकरण अलंकार वर्कशॉप
कलम की सुगंध छंदशाला में दिसम्बर माह की वर्कशॉप का आयोजन किया गया जिसका मुख्य विषय 'मानवीयकरण अलंकार' रहा। जिसकी अध्यक्षता आदरणीया सुशीला जोशी जी मुज्जफरनगर ने की इस वर्कशॉप में मुख्यातिथि के तौर पर आदरणीया कुसुम कोठारी जी सादर आमंत्रित की गई लगभग 150 कवि परिवार की उपस्थिति में यह ऑनलाइन वर्कशॉप अपने उद्देश्य की पूर्ति करती हुई पूर्ण सफल रही इस वर्कशॉप की संचालिका आदरणीया अनिता मंदिलवार सपना जी रही जिसका समापन दोहा अंताक्षरी के साथ किया गया।
कार्यक्रम दौरान कवि परिवार में नवांकुर कवि एवं कवयित्रियों द्वारा जिज्ञासा वश अनेकों प्रश्न किये गए जिनका उत्तर आदरणीया सुशीला जोशी कार्यक्रम अध्यक्ष और मुख्यातिथि कुसुम कोठारी जी द्वारा समय समय पर दिया गया सभी लाभान्वित हुए इस वर्कशॉप से और भविष्य में भी इस प्रकार की मासिक वर्कशॉप के आयोजन के लिए संचालन परिवार द्वारा योजना बनाई गई।
प्रस्तुत है वर्कशॉप का सारांश ......
🙏🙏🙏आदरणीय संजय कौशिक "विज्ञात" सर का सुझाव था 👇
छंदशाला में एक और वर्कशाप का आयोजन होना चाहिए
जिसकी असध्यक्षता आदरणीया सुशीला जोशी जी करेंगी मुख्यातिथि आदरणीया कुसुम कोठारी जी रहेंगी
विषय रहेगा
रचना में मानवीकरण का प्रयोग कैसे करें ....
मानवीकरण से रचना कैसे बोल उठती है ....
मानवीकरण संबंधित अनेक प्रश्न और जिज्ञासा जिन पर आदरणीया सुशीला जी मंच का मार्गदर्शन करेंगी
दिन सर्वसम्मिति से सुनिश्चित कर लीजिए
मुख्य मंच संचालक आदरणीया अनिता मंदिलवार सपना जी से निवेदन है कि सबके हित को ध्यान में रखते हुए सबकी उपस्थिति हो सके ऐसे समय का निर्धारण कर सूचना प्रेषित करें 🙏🙏🙏
आदरणीया अनिता मंदिलवार "सपना" जी के संचालन में शुक्रवार 13.12.2019 को दोपहर 3:00 से संध्या 7 बजे तक का समय निर्धारित हुआ जिसमें मंच के सभी सदस्यों ने बहुत उत्साह से भाग लिया 🙏🙏🙏
*प्रस्तुत है वर्कशाप का सारांश* 🙏🙏🙏
सुशीला जोशी जी : *किसी भी जड़ या जंगम वस्तु का मानवीयकरण तब किया जाता है जब सम्पूर्ण सृष्टि किसी के दुख से दुखी या सुख से सूखी लगे । उस स्थिति में वेदना या प्रसन्नता उसकी अपनी न रह कर सर्वव्यापी बन जाती है ।उसकी पीड़ित  चेतना में वर्षा में आँसू  और कमल का खिलना उसे व्यंग दिखाई देता है । जबकि वही सब उपादान सुख में उसे गाते नाचते लगते है ।*
    *मानवीयकरण  लेखक की सजीव व  सशक्त कल्पना है जिसके माध्यम से वह अपनी रचना को महीन ,कोमल ,संवेदनशील और सर्वव्यापी बनाता है।*
अनीता मंदिलवार -सपना जी : बहुत ही यथार्थ जानकारी दीदी 🙏🙏
कुसुम कोठारी जी: आज कार्यशाला में(खुले मंच पर) आदरणीय शुशील दीदी मानवीयकरण अलंकार के बारे में बताएंगे आप सभी को जो भी जिज्ञासा हो कृपया सूची बंध करें।
कुसुम कोठारी जी : अपनी जिज्ञासा रखेगें तो समाधान के साथ बहुत कुछ जानकारियां मिलेगी।
नीतू : अलंकार क्या है और कविता या गीत में कैसे प्रयोग करें तो रचना सज जाए 🙏
कुसुम कोठारी जी : *कवि या लेखक अपनी भाषा और भावों के सौंदर्य में वृद्धि करना चाहता है। उस सौंदर्य की वृद्धि के लिए जो साधन अपनाए गए , उन्हें ही "अलंकार" कहते हैं। उनके रचना में सौंदर्य को बढ़ाया जा सकता है , पैदा नहीं किया जा सकता।
ऐसे ही "मानवीयकरण" अलंकार का एक भेद है  
जहाँ जड़ वस्तुओं या प्रकृति पर मानवीय चेष्टाओं का आरोप किया जाता है, वहाँ मानवीकरण अलंकार होता है।*
तोषण जी : उदाहरणार्थ...ताकि समझने और असानी हो...    
नीतू : मानवीकरण में जिसका मानवीकरण कर रहें है उसके साथ न्याय करना मुश्किल होता है...क्योंकि उसमें रचनाकार अपने भाव व विचार रखता है ....ऐसे में क्या करें?
कुसुम कोठारी जी : *रचनाकार जब भी मानवीयकरण करता है तब हो सकता है वस्तु का सार गुण धीमा पड़ जाए पर दूसरी और वो उसका सुंदर विश्लेषण देता है जो रचना के साथ उस वस्तु के सौंदर्य में वृद्धि करता है ।*
*कवि का काम सृजन करना है।प्रकृति अपनी मौलिकता बनाए रखती है। कवि कभी भी प्रकृति को नुक्सान नहीं पहुंचाता।*
अनीता मंदिलवार -सपना जी : सही कहा  
नीतू : पूर्ण सहमत 🙏
सुशीला जोशी जी : *मानवीयकरण में न्याय या अन्याय का तो प्रश्न ही नही उठता ।  मानवीयकरण कवि का सखा/सखी , प्रेमी/प्रेम का साक्षी ही बनता है । 
जैसे मैं नीर भरी दुख की गगरी 
महादेवी का दुख एक जल से भरे गागर जैसा है । इसमें उन्होंने जल को पीड़ा और गागर को पीड़ित दर्शाया है ।अर्थात ऐसी गागर जिसमे पीड़ा का जल भरा रहता है ।  इन शब्दों से उनके दुख की तीव्रता दर्शित हो रही है । जल या गगरी के साथ न्याय या अन्याय कहाँ ??
   रामायण में राम जब सीता को वन में खोजते फिर रहे है तो वे एक एक वृक्ष ,लता से पूछते फिर रहे है --
....... क्या देखी मृगनैनी ।।
निश्चित लता या वृक्ष नही बोलेगे ।लेकिन राम उन्हें सजीव साक्षी मान कर उनसे सम्वाद कर रहे है ।इसमें लता या वृक्षों के न्याय या अन्याय कहाँ ?*
कुसुम कोठारी जी : जैसे हम कहते हैं फूल खिला है
ये साधारण प्रक्रिया है वहीं कहते हैं फूल मुस्कुराए या मुसकाये तो भाव मुखरित होते हैं
नीतू : मेरे अंतर मन का दर्पण या मेरी परछाई हो,
कौन हो तुम जो इस दुनिया में मेरी खातिर आई हो ?
चंद्र सी आभा मुख मंडल पर,जुल्फ घटा सी छाई है,
चन्द्रबदन,मृगनयनी हो तुम तन पर चिर तरुणाई है,
चाल चपल चंचला के जैसी ,स्वर में तेरे गहराई है,
तुमने मुझको जनम दिया है,या तू मेरी जाई है ? 
मेरे अंतर मन का दर्पण या मेरी परछाई हो,
कौन हो तुम जो इस दुनिया में मेरी खातिर आई हो ?
कभी हंसाती,कभी रुलाती कभी रोष दर्शाती हो,
कौन हो तुम जो मन की बातें बस मुझको बतलाती हो ?
मेरी कविता,मेरी रचना तू मेरा संसार है,
तूने मेरा चयन किया है ये तेरा उपकार है,
मेरे अंतर मन का दर्पण या मेरी परछाई हो,
कौन हो तुम जो इस दुनिया में मेरी खातिर आई हो ?
- नीतू ठाकुर
👆इसमें मैने अपनी कविता का मानवीकरण करने की कोशिश की है ...क्या ठीक से कर पाए है 🙏
  सुशीला जोशी जी : *नही मैम ,यह मानवीयकरण नही है ।इसमें आपने अपनी बेटी या अन्य चरित्र को विशेषताओं को अलंकारो के माध्यम से दर्शाया है ।*  
   निराला की कविता ..
अबे !सुन बे ओ गुलाब !
तूने पाया जो रंगों आब ....
...........डाली पे इठला रहा
कैपिटलिस्ट ।
*पढ़े तो आपको वास्तव में अनुभव होगा कि सम्पन्न लोग और गुलाब में कितनी समानता है ।।
यह व्यंग में लिखी गयी कविता है जो  गुलाब को कपेटेलिस्ट मान कर बात कर रहा है जो आज भी समसामयिक है । यद्यपि  गुलाब प्राणी नही है लेकिन प्राणी मान कर लिखा गया व्यंग कितना सार्थक सिद्ध है ।*  
  नीतू : इस रचना को लिखते वक्त बेटी का ख्याल मन में नही था बल्कि एक सवाल था ...कवि कविता को जन्म देता है या कविता कवि को। मेरी रचना का स्वरूप कैसा है  🙏 आप का उदाहरण बहुत सुंदर है और यह रचना अवश्य पढूंगी ....बहुत सुंदर जानकारी दी आपने ....आभार 🙏    
  कुसुम कोठारी जी : जी बहुत सुंदर जानकारी दीदी जी एक भ्राति मिटी 🙏 
 वंदना सोलंकी जी: बहुत ज्ञानवर्धक जानकारी दी है आपने आदरणीया🙏👌👌
 नीतू : आप के उत्तर से मुझे मेरा उत्तर मिल गया 😀 आभार आप का ...रचना सफल हुई क्योंकि रचनाकार के लिए हर रचना उसके बच्चे जैसी ही होती है 🙏🙏🙏  
अलंकार का प्रयोग करते वक़्त किन चीजों का ध्यान रखना आवश्यक है ...जिस से रचना और निखर जाए 🙏 क्योंकि गलत प्रयोग प्रयोग गलत ही रूप देगा रचना को .….इसके लिए कल्पनाशक्ति जबरजस्त होना जरूरी है ऐसा मेरा मानना है।
कुसुम कोठारी जी : इस तरह की कुछ कविताएं मैंने लिखी है और मैं स्वयं भ्रम में हूं कि ये वास्तविक मानवीयकरण है या नहीं और आज मैं ये जिज्ञासा शुशील दीदी जी से रखने वाली थी ।
क्योंकि इस रचना में हम प्रकृति पर मानव चेष्टा नही थोप रहे बल्कि मानव पर प्रकृति को स्थापित कर रहें हैं जैसे आपने नायिका को हर जगह प्रकृति संग स्थापित किया है ..
चंद्र सी आभा
घटा ही जुल्फ  आदि-आदि।
तो मेरा शुशीला दीदी से निवेदन है कि हमारी जिज्ञासा शांत करें ।🙏 
कुसुम कोठारी जी : तब तक मेरी मानवीयकरण पर एक रचना का अवलोकन करें
कुसुम कोठारी जी : अप्रतिम सौन्दर्य
हिम  से आच्छादित
अनुपम पर्वत श्रृंखलाएँ
मानो स्फटिक रेशम हो बिखर गया
उस पर ओझल होते
भानु की श्वेत स्वर्णिम रश्मियाँ
जैसे आई हो श्रृँगार करने उनका
कुहासे से ढकी उतंग चोटियाँ
मानो घूंघट में छुपाती निज को
धुएं सी उडती धुँध
ज्यों देव पाकशाला में
पकते पकवानों की वाष्प गंध
उजालों को आलिंगन में लेती
सुरमई सी तैरती मिहिकाएँ
पेड़ों पर छिटके हिम-कण
मानो हीरण्य कणिकाएँ बिखरी पड़ी हों
मैदानों तक पसरी बर्फ़ जैसे
किसी धवल परी ने आंचल फैलया हो
पर्वत से निकली कृष जल धाराएँ
मानो अनुभवी वृद्ध के
बालों की विभाजन रेखा
चीङ,देवदार,अखरोट,सफेदा,चिनार
चारों और बिखरे उतंग विशाल सुरम्य
कुछ सर्द की पीड़ा से उजड़े
कुछ आज भी तन के खड़े
आसमां को चुनौती देते
कल कल के मद्धम स्वर में बहती नदियाँ
उनसे झांकते छोटे बड़े शिला खंड
उन पर बिछा कोमल हिम आसन
ज्यों ऋषियों को निमंत्रण देता साधना को
प्रकृति ने कितना रूप दिया  कश्मीर  को
हर ऋतु अपरिमित अभिराम अनुपम
शब्दों  मे वर्णन असम्भव।
   कुसुम कोठारी।
   " गिरा अनयन नयन बिनु बानी "

अभिलाषा चौहान जी: वह संध्या सुंदरी परी सी
गिरि का गौरव गाकर निर्झर
निराला और पंत की ये पंक्तियां या पूरी रचनाएं
मानवी करण का उत्तम उदाहरण है न दीदी
कुसुम कोठरी जी : 👌जी सही ।  
अभिलाषा चौहान जी : छायावादी रचनाओं में मानवीकरण का बड़ा ही सुन्दर चित्रण है। यहां पर इसका चरम सौंदर्य प्रकट हुआ है।

कुसुम कोठरी जी : छाया वादी काल में अलंकारों  का अनुपम अभिनव प्रयोग हुवा है । जो अतुल्य है।
अभिलाषा चौहान जी : मानवीकरण प्रकृति का किया जाता है।अर्थात प्रकृति पर मानवीय चेष्टाओं का आरोप।जबकि मानव की प्रकृति के साथ तुलना पर उपमा उत्प्रेक्षा या रूपक अलंकार का प्रयोग होता है ।है ना दीदी।क्या मैं सही हूं।
आरती श्रीवास्तव जी:
मैं नीर भरी दुःख की बदली,
विस्तृत नभ का कोई कोना
मेरा नाम कभी अपना होना
परिचय इतना इतिहास यही
उमड़ी कल थी,मिट आज चली।
महादेवी वर्मा🙏🏽🙏🏽
अनीता मंदिलवार -सपना जी : और  सभी भी इस चर्चा में शामिल हों । लाभ ही होगा🙏🌹
डॉ. कमल वर्मा जी : आ दीदी नमस्कार। मानवी करण में जीव को मानव माना जाता है या निर्जीव या दोनों को। प्रायःनदी को अल्हड़ नवयौवना की तरह मान कर मैंने कुछ कविताएँ लिखी है।
पहाड़ को भाई या पिता की तरह रक्षक।
क्या दोनों मानवीकरण है।
कमल
सुशीला जोशी जी : *बिल्कुल नही ।मानवीयकरण किसी वस्तु के गुण दोष देख नही किया जाता । वह तो स्वयं कवि की मनःस्थिति के अनुसार होता है ..
      बहुत गुलाबी हँसी तुम्हारी
      तभी तो हमको लुभा रही हो ।।
इसमें हँसी को गुलाबी कहा जो कवि के मनमे उगते प्रेम को दर्शा रही है । इसमें हँसी का गुण धीमा नही पड़ा वरन गुण दुगना हो रहा है और हँसी को और अनुपम बना रहा है।
     तुम्हारी खामोशी हम पे भारी
    क्यो हमको ऐसे जला रही हो ।।
अब यहाँ खामोशी का गुण दुगना हो रहा है जिससे कवि आहत है ,आकुल है । इसमें ख़ामोशी नायक का कार्य कर रही है ।*
डॉ. कमल वर्मा जी : जिसे अंग्रेजी में personification कहतें है, वह है?
वंदना सोलंकी जी: निर्झर ल फूटफूट कर रो रहे
फूल पत्तियां भी सिसक पड़ी
मसली जा रही मासूम कलियां
उपवन की डाली बिलख रही ।।
*वंदना सोलंकी*
आदरणीया सुशीला जी ,,क्या ये रचना मानवीकरण के मानक पर खरी उतरती है?🙏🏻🙏🏻
सादर समीक्षार्थ
सुशीला जोशी जी : *जीव तो जीवित है उसका मानवीयकरण नही होता लेकिन बेजुबान  प्राणियों का मानवीयकरण सम्भव है। जैसे तोता ,मैना, चिड़िया , मृग या फिर कोई आपका पालतू प्राणी ।*
अनुराधा चौहान जी : गुलमोहर तुम क्यों नहीं हँसते
क्यों नहीं खिलते नवपुष्प लिए
इतराते थे कभी यौवन पर
शरमा उठते थे सुर्ख फूल लिए
कर श्रृंगार सुर्ख लाल फूलों से
सबके मन को लुभाते थे
खड़े आज भी तुम वैसे ही हो
बस लगते थोड़े मुरझाए हो
*अनुराधा चौहान*
*सादर समीक्षार्थ*
वंदना सोलंकी जी: इसमें ल को न पढ़ा जाए।टंकण त्रुटि🙏🏻😀
नीतू : पूर्ण सहमत ....सुंदर जानकारी 👌मार्गदर्शन के लिए आभार 🙏
सुशीला जोशी जी : *बहुत सुंदर ।गुलमोहर जो कभी आपकी खुशी का कारण था आज मुरझाया सा लग रहा है ।शायद वह आपके दुख से दुखी है ।*
अनुराधा चौहान जी : हार्दिक आभार दीदी
नीतू : बहुत ही खूबसूरती से समझाया आपने ...बहुत सही 🙏बहुत खूब 👌
अनुराधा चौहान जी : हार्दिक आभार सखी
सुशीला जोशी जी : *मानवीयकरण नही छायावाद है ।आपने आज के परिवेश को अन्य माध्यम से दर्शाया है ।*
नीतू : इस बात से यह तो स्पष्ट है जिसका मानवीकरण कर रहे हैं उसका भावना से निकटतम संबंध होना जरूरी है 🙏
नीतू : हर रचनाकार अपनी कल्पना शक्ति के हिसाब से मानवीकरण करता है ...पर उत्तम मानवीकरण के क्या गुण हैं ?
कुसुम कोठरी जी : तुम्हार होंठों जैसे  गुलाब
में मानवीयकरण है अतिशयोक्ति भी तो इसमें  गुलाब को होंठों सा बताया है तो गुलाब की महत्ता बढ़ी या घटी है या फिर और कोई भाव उभर रहा है कृपया बताएं दीदी जी।
अभिलाषा चौहान जी : मेघ गाते आ रहे मल्हार नभ में
विहग अवली झूमती जाती गगन में
बन गलहार मेघ का सत्कार करने
पवन मुक्त छंद स्वागत गान करते
वृक्ष भी लय ताल संग नृत्य करते
मोर दादुर कोयल पपीहा राग छेडें
मेघ मल्हार संग अपनी तान जोडें
बरस उठी चहुंओर रसधार है अब
प्रकृति भी रसरंग में डूबी हुई अब
प्रिय प्रेम की बूंदो का स्पर्श पाकर
अवनि ने कर लिए श्रृंगार सोलह
प्रिय मिलन की घड़ी  समीप आई
देख प्रिय को विरहिणी है लजाई
चंचला दामिनी पल-पल बताए
मेघ मल्हार अलापते आ गए हैं
प्रियतमा पर प्रेमरस बरसा रहे हैं
मिलन का संगीत है देखो अनूठा
धरा से नवजीवन का अंकुर फूटा
हर्ष का पारावार है चहुंओर अब
ओढ ली अवनि ने धानी चुनर जब
सृष्टि भी निखरती जा रही अब
मेघ सारे कलुष को धो रहे हैं
दीदी इस रचना पर समीक्षा करें कृपया
अभिलाषा चौहान
सादर समीक्षार्थ 🙏🌷
डॉ कमल वर्मा जी : दीदी जी ऐसे तो कई गीत है।
जैसे__देखो वह चाँद हँसकर इशारे कर रहाहै।
क्या मानवी करण है?
कुसुम कोठरी जी : जी ये तो मानवीयकरण है
सुशीला जोशी जी : *यह मानवीयकरण है कहाँ?? अपने होठों को गुलाब जैसा बताया है । यह तो अलंकार है । मानवीयकरण का अर्थ किसी चीज को वही बना देना जिसे आप  चाहते है ।
नदी का बहना / नदी का दौड़ना
दोनो में  यही अंतर है ।*
डॉ कमल वर्मा जी : हाँ मै समझी थी। धन्यवाद
सुशीला जोशी जी : *मैं कब उसे मना कर रही  हूँ । गीतों में आज भी मानवीयकरण और छायावाद का बोलबाला है ।*
वंदना सोलंकी जी: जी,हार्दिक आभार🙏🏻
कुसुम कोठरी जी : जी मैंने पूछा था कोई गुलाब को दिखा कर कह रहा है प्रेयसी से कि देखो ये गुलाब तुम्हारे होठों जैसे है
सुशीला जोशी जी : यह उपमा हुई न । मानवीयकरण नही ।
डॉ कमल वर्मा जी : धन्यवाद हृदय से। आदरणीय बहुत सुंदर चर्चा के लिए। आ जोशी दीदी जी को भी धन्यवाद एवं नमस्कार।
संजय कौशिक " विज्ञात" सर  : मानो मनु ज्यों जनु जैसे
उपमा
सुशीला जोशी जी : पहले आप अपनी इस रचना को किसी विधा के अंतर्गत रखिये । फिर बात करेंगे समीक्षा की ।
 सुशीला जोशी जी : जी यह भी उपमा अलंकार है
 संजय कौशिक "विज्ञात " सर  : जी 🙏🙏🙏
कुसुम कोठरी जी : तुम्हारे होंठ गुलाब जैसे ..उपमा
गुलाब तुम्हारे होंठ जैसे इसमें गुलाब को  होंठों सा कहना भी उपमा ही होगा क्या आदरणीय।
सुशीला जोशी जी : जी हाँ ।
कुसुम कोठरी जी : 🙏जी सादर
डॉ कमल वर्मा जी : अगर हम कहते हैं, उसमें बिजली सी चंचलता है तो उपमा हुई।
चंचल बिजली आसमान में चमक कर आगे राह दिखा रही थी। मानवीकरण है।
सुशीला जोशी जी : *मानवीकरण कामायनी में दिखिए जिसमें मानवीय मनोवृत्तियों को चरित्र में ढाल कर पूरा ग्रन्थ रचना ।*
डॉ कमल वर्मा जी : ठीक समझी हूँ न आ दीदी जी।
सुशीला जोशी जी : *नही , स्वयं के गुणों का प्रकृति के माध्यम से गुणगान है या अलंकारिक आत्मश्लाघा है ।।*
श्वेता सिन्हा जी : जी प्रणाम दी मेरी एक रचना की समीक्षा कर दीजिए कृपया
लह-लह,लह लहकी धरती
उसिनी पछुआ सहमी धरती
सही गयी न नभ से पीड़ा
भर आयी बदरी की अँखियाँ
लड़ियाँ बूँदों की फिसल गयी
टप-टप टिप-टिप बरस गयी 
अंबर की भूरी पलकों में
बदरी लहराते अलकों में
ढोल-नगाड़े सप्तक नाद
चटकीली मुस्कान सरीखी
चपला चंचल चमक गयी
बिखर के छ्न से बरस गयी
थिरके पात शाख पर किलके
मेघ मल्हार झूमे खिलके
पवन झकोरे उड़-उड़ लिपटे
कली पुष्प संग-संग मुस्काये
बूँदें कपोल पर ठिठक गयी
जलते तन पर फिर बरस गयी
कुसुम कोठरी जी : कोई भी अपनी जिज्ञासा रख सकता है दीदी सब की जिज्ञासा का हल करेंगे🙏
श्वेता सिन्हा जी : जी दीदी जब हम मानवीयकरण करते हैं तो जिस प्राकृतिक बिंब का प्रयोग कर रहे उसका प्रयुक्त भावों से तालमेल होना आवश्यक है न?
जैसे कि किसी पुष्प का बिंब कोमलता के भाव के लिए प्रयुक्त किया जायेगा ना..?
कुसुम कोठरी जी : जब तक आदरणीय दीदी सब की समस्या समाधान देती हैं सरल शब्दों में मानवीयकरण..
फूल हंसे कलियां मुसकाईं।
यहाँ फूलों का हँसना, कलियों का मुस्कराना मानवीय चेष्टाएँ हैं। अत: मानवीकरण अलंकार है।
मानवीयकरण अलंकार में दूसरी निर्जीव चीजों में सजीव होने की बात दर्शाई जाती है. यानी उस जी चीज में मानव होने का बोध कराया जाता है।
यानि हम कह सकते हैं कि जब किसी कविता, दोहे या गद्य में प्रकृति को मनुष्य की तरह व्यवहार करते हुए दिखाया जाये, तो उसे मानवीकरण अलंकार कहते हैं। जैसे - मेघ आये बन ठन के, सज-संवर के, इस वाक्य में बादलों का मानवीकरण किया गया है. इससे गद्य व पद्य की सुन्दरता कई गुनी बढ़ जाती है।
नीतू : मतलब ओठों की तुलना गुलाब से करना उपमा है और कटे हुए वृक्ष को देखकर कटे हाथ लिखना मानवीकरण 🙏
कुसुम कोठरी जी : मेरी एक अतुकांत रचना की कृपया समीक्षा किजिए दीदी जी, इसमें कुछ मानवीयकरण है भी या सब उपमा अलंकार ही है।
अतुकान्त नव विधा
अप्रतिम सौन्दर्य
हिम  से आच्छादित
अनुपम पर्वत श्रृंखलाएँ
मानो स्फटिक रेशम हो बिखर गया
उस पर ओझल होते
भानु की श्वेत स्वर्णिम रश्मियाँ
जैसे आई हो श्रृँगार करने उनका
कुहासे से ढकी उतंग चोटियाँ
मानो घूंघट में छुपाती निज को
धुएं सी उडती धुँध
ज्यों देव पाकशाला में
पकते पकवानों की वाष्प गंध
उजालों को आलिंगन में लेती
सुरमई सी तैरती मिहिकाएँ
पेड़ों पर छिटके हिम-कण
मानो हीरण्य कणिकाएँ बिखरी पड़ी हों
मैदानों तक पसरी बर्फ़ जैसे
किसी धवल परी ने आंचल फैलया हो
पर्वत से निकली कृष जल धाराएँ
मानो अनुभवी वृद्ध के
बालों की विभाजन रेखा
चीङ,देवदार,अखरोट,सफेदा,चिनार
चारों और बिखरे उतंग विशाल सुरम्य
कुछ सर्द की पीड़ा से उजड़े
कुछ आज भी तन के खड़े
आसमां को चुनौती देते
कल कल के मद्धम स्वर में बहती नदियाँ
उनसे झांकते छोटे बड़े शिला खंड
उन पर बिछा कोमल हिम आसन
ज्यों ऋषियों को निमंत्रण देता साधना को
प्रकृति ने कितना रूप दिया  कश्मीर  को
हर ऋतु अपरिमित अभिराम अनुपम
शब्दों  मे वर्णन असम्भव।
              कुसुम कोठारी।
   " गिरा अनयन नयन बिनु बानी "
सुशीला जोशी जी : *मानवीयकरण सोच समझ कर नही किया जाता । उस समय जैसे मनःस्थिति होती है उसी के अनुरूप उपादन स्वयं उपस्थित हो जाते है ।राम ने वृक्षों को जान बुझ कर साक्षी नही बनाया ।।उन्हें आभास था को सीता जिस रास्ते से गयी है उसके सभी उपदान उनके साक्षी हो सकते है ।इसलिए वह लगातार पूछते आगे बढ़ते रहे ।*
सुशीला जोशी जी : काँख में सूरज दबाएँ
आ गया लोघन कुहासा
धुन्ध की चादर लपेटे
गढ़ रहा है  नई भाषा ।।
यह मानवीयकरण है ।।
कुहासे का मानवीयकरण है ।।
नीतू : बहुत बहुत आभार सुशीला दीदी जी आप के स्पस्टीकरण ने शंकाओं का समाधान कर दिया ....मानवीकरण को इतनी गहराई से हमने कभी सोचा ही नही था 🙏
नीतू : उपमा और अलंकार भी उलझे हुए से थे ...कुछ सुलझ गए
कुसुम कोठरी जी : जी सही कहा हम नवांकुर हैं, दी जैसी उर्वरक भूमि मिलेगी तो जरूर खिलेगें।
सुशीला जोशी जी : *जी नही ।। किसी जड़ वस्तु को मानवीय संवेदना से देखना मानवीयकरण है ।  कभी कभी आप गुड़ियों से भी बातें करती होगी ,खिलौनों से बातें करती होगी । तो क्या वे सुन रहे है ?? नही आपके हृदय की स्थिति उन्हें आपका मित्र ,बच्चा , भाई या फिर कोई भी बना रहा है ।*
सुशीला जोशी जी : चीत्कार करे
हांडी भुनता मुर्गा
जीभ का स्वाद
नीतू : जी आदरणीया ...समझ गए
हे निर्झर क्यों हो शांत आज
लगता है मन आक्रांत आज
नवगीत कोई फिर गाओ न
मन को मेरे बहलाओ न
इस तरह हम झरने को अपना मित्र मान कर बात  करें वो भी मानवीकरण है
नीतू : *कहती है मुझसे मधुशाला*
कहती है मुझसे मधुशाला मुझसे इतना प्यार ना कर
मै हूँ बदनामी का प्याला तू मेरा स्वीकार ना कर।
इज्जत, शोहरत सुख और शांति किस्तों में लुट जाती है
मिट जाती है भाग्य की रेखा जब मुझसे टकराती है
पावन गंगा जल भी मुझमे मिलकर विष बन जाता है
जो भी पीता है ये प्याला नशा उसे पी जाता है।
कहती है मुझसे मधुशाला मुझसे इतना प्यार ना कर
मै हूँ बदनामी का प्याला तू मेरा स्वीकार ना कर।
मेरी सोहबत में ना जाने कितने घर बर्बाद हुए
छोड़ गए जो तन्हा मुझको वो सारे आबाद हुए
ऐसा दोष हूँ जीवन का जीवन को दोष बनाती हूँ
प्रीत लगाता है जो मुझसे उसका चैन चुराती हूँ।
कहती है मुझसे मधुशाला मुझसे इतना प्यार ना कर
मै हूँ बदनामी का प्याला तू मेरा स्वीकार ना कर।
भूले भटके जग से हारे पास मेरे जब आते हैं
मीठे जहर के छोटे प्याले उनका मन ललचाते हैं
बहक गया जो इस मस्ती में उसका जीवन नाश हुआ
समझ ना पाया वो खुद भी कैसे वो इसका दास हुआ।
कहती है मुझसे मधुशाला मुझसे इतना प्यार ना कर
मै हूँ बदनामी का प्याला तू मेरा स्वीकार ना कर।
गाढे मेहनत की ये कमाई ऐसे नहीं लुटाते हैं
लड़ते हैं हालत से डटकर वहीं नाम कर जाते हैं
बहक नहीं सकता तू ऐसे तू घर का रखवाला है
एक तरफ है जीवन तेरा एक तरफ ये प्याला है।
कहती है मुझसे मधुशाला मुझसे इतना प्यार ना कर
मै हूँ बदनामी का प्याला तू मेरा स्वीकार ना कर।
- नीतू ठाकुर
सुशीला जोशी जी : मौन ही करता रहा
मौन से संवाद ।।
मौन गन्ध संग में।
साँझ थी चढ़ी चढ़ी
नीम भी हरा भरा
धरनी चित चुप पड़ी
बुदबुदाते ही रहे
व्यर्थ का ही वाद ।।
देखिए मानवीयकरण की पंक्तियाँ
नीतू : जी आदरणीया 
देख रही घूँघट पट खोले
नील गगन प्यासी धरती
इसमें भी आप ने सुंदर मानवीकरण किया था 🙏🙏🙏
  सुशीला जोशी जी : जी ,शुद्ध मानवीकरण 🌺 
रजनी रामदेव जी : देखें आदरणीया, इस दोहे में मानवीयकरण हुआ क्या???? प्रेम पपीहा
नैनों में सपने सजे,   सपनों में तस्वीर।
प्रेम पपीहा आ मुझे,करने लगा अधीर।।
                     रजनी रामदेव
                      न्यू दिल्ली
महातम मिश्र  जी : आदरणीया सुशीला जी मेरे मुक्तक मानवीयकरण पर हैं क्या?, सादर
"मुक्तक"
नहीं किनारे नाव है, नहीं हाथ पतवार।
सूख रहा जल का सतह, नहीं उदधि में धार।
नयन हुए निर्लज्ज जब, मन के भाव कुभाव-
स्वारथ की नव प्रीति में, नहीं हृदय में प्यार।।1
जल प्रवाह में कट रहे, वर्षों खड़े कगार।
आर-पार नौका चली, तट पर भीड़ अपार।
कैसा खेवनहार यह, नई नवेली नाव-
डर लगता है री सखी, मम साजन उस पार।।-2
महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

सुशीला जोशी जी : जी नही । आपकी अभ्यस्त शैली बोल रही है । कहीं कहीं अलंकृत भाषा का प्रयोग है ।
श्वेता सिन्हा जी : जी दी कृपया मेरी कविता की समीक्षा करें🙏
सुशीला जोशी जी : जी प्रणाम दी मेरी एक रचना की समीक्षा कर दीजिए कृपया
लह-लह,लह *कर* लहकी धरती *16*-- 14
उसिनी पछुआ सहमी धरती।। 16
सही गयी न (नभ) *व्योम*  से पीड़ा 15 -- *16*
भर आयी बदरी की अँखियाँ16
*टप टप टिप टिप फूल बरजती* 16
(लड़ियाँ बूँदों की फिसल गयी)
*फिसल गई बूंदों सी पखियाँ*
टप-टप टिप-टिप बरस गयी
*दरक दरक दरकी जब धरती* ।। 16
अंबर की भूरी पलकों में 16
*ढोल नगाड़े सप्तक नाद*
बदरी लहराते अलकों में 16
*चटकीली मुस्कराती याद* 16
(ढोल-नगाड़े सप्तक नाद)
(चटकीली मुस्कान सरीखी)
(चपला चंचल चमक गयी )
*चपला चंचल चमक बरसती* 16
(बिखर के छ्न से बरस गयी)
*पवन झकोरे उड़ उड़ लिपटे* 16
थिरके पात शाख पर किलके
*पुष्प कली सँग सँग मुस्काये* 16
मेघ मल्हार झूमे  खिलके 16
*ठिठक गाल मनुहार  लरजती* 16
(पवन झकोरे उड़-उड़ लिपटे)
(कली पुष्प संग-संग मुस्काये)
(बूँदें कपोल पर ठिठक गयी )
(जलते तन पर फिर बरस गयी)
लीजिये मैम आपका यह एक सुंदर गीत बनगया ।।
आप कल्पना ,शब्द संयोजन और शैली में सिद्धहस्त है ।स्वयं को गीत की ओर मोड़िये ।बहुत आशा है आप से । 🙏🏼🌺
सुशीला जोशी जी : पढ़िए अपना गीत श्वेता जी।।
नीतू : बधाई हो श्वेता जी 💐💐💐💐  
श्वेता सिन्हा जी : ओहहो अचंभित है हम...शब्द नहीं क्या.कहे दीदी  
इस सार्थक चर्चा में मानवीकरण, उपमा और अलंकार के विषय में विस्तार से जानने का मौका मिला और आदरणीया सुशीला दीदी और कुसुम कोठारी जी के अनुभव और जानकारी का लाभ सभी ने उठाया ....हम हृदयतल से उनका आभार व्यक्त करते हैं 🙏
इस शानदार चर्चा के लिए सभी बधाई के पात्र हैं 💐💐💐
सादर नमन 🙏🙏🙏

नीतू ठाकुर
मीडिया प्रभारी
कलम की सुगंध

Monday, 25 November 2019

उड़ान .... धनेश्वरी देवांगन‌ "धरा

*विधा-------छंद मुक्त*
*विषय -------उड़ान*

सुनो मेरी  दिल की आवाज है ये 
भर  अब *उड़ान*
छू ले  आसमान 
आज कह रहा मेरा दिल 
मुझसे ये बार -बार
मत बंध बंधनों में
छोड़ दे जकड़न
तोड़ दे जमाने के सारे बंधन 
कर ले अपने ख्वाहिशों को साकार
बजा धडकनों के तार ...
कहता हर बार ....
कहता है चल उड़ चल 
स्वछन्द आसमान में...
अपनी ख्वाहिशों के पंख लगा के
तान फड़फडा़ने की मधुर साज सा लगे
साज की धुन में खोती जा ....
आज जी ले जिन्दगी..
ताजी - ताजी हवाओं के साथ बह चल
हवाओं की सरसराहट की सरगम में 
झूम ले मस्त मोरनी बन ...
भर ले चाँद तारों को अपने आँचल में
कर ले हर चाहत पूरी
अनसुलझे सवालों में और मत उलझ
अनकहे जवाबों में ना सिमट
तोड़ ना सही, कभी
रस्म रवायत हैं जो जहां के.
अपने हसरतों को ले के 
जिंदगी को मुस्कुरा के जी 
सब को हंसा के जी
दिल ये कहता है आज 
जो दिल से जुड़ा है...
वो दिल से जुदा ना होने पाये 
दिल से जुड़े हर रिश्ते को निभा के जी
टीस दी जिसने उसे भूला के जी
हर मीठी अहसास को जी..
दिल में उठते हर ज़ज्बात को जी
अपनी आकांक्षाओं को दुनिया के 
पैरों तले कुचलने ना दे
जी ले, खुल कर जी ले, ..
कहे मेरी दिल की आवाज़..
तोड़ दे सारे  बंधन.
सुनो मेरी दिल‌ की आवाज़ है ये 
भर अब *उड़ान*
छू ले आसमान  


*धनेश्वरी देवांगन‌ "धरा"
*रायगढ़ (छत्तीसगढ़)*
@Kalam Ki Sugandh

उड़ान ( दोहा ).... इन्द्राणी साहू " साँची "

विषय - उड़ान
विधा - दोहा
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बेटी के अरमान को ,दो मजबूत उड़ान ।
जकड़ कुरीति नहीं करो ,कुंठित नन्ही जान ।।
***
पिंजरबद्ध विहंग सा ,पराधीन इंसान ।
विवश गगन को देखते , बाधित सभी उड़ान ।।
***
पर छीने पक्षी पड़े , कैसे भरे उड़ान ।
साहस का मरहम लगा ,फूँके खुद में प्राण ।।
***
परवशता को त्याग कर , साहस संबल धार ।
नारी उच्च उड़ान से , जीत रही संसार ।।
***
उत्तरोत्तर समृद्ध हो , भरते उच्च उड़ान ।
विश्व पटल पर है अमिट ,भारत की पहचान ।।
***
जंजीरों को तोड़कर ,भर लो उच्च उड़ान ।
नवल सृजन हित आज सब , छेड़ो नव अभियान ।।
***
क्षमता के अनुरूप ही ,रखिए सदा उड़ान ।
चाहत करना अधिक की , देता है अपमान ।।
***
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✍️इन्द्राणी साहू "साँची"✍️
   भाटापारा( छत्तीसगढ़)
★★★★★★★★★★★★★★★
@kalam ki Sugandh