Showing posts with label तोंद झूठ की बढ़ी हुई है" ....डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'. Show all posts
Showing posts with label तोंद झूठ की बढ़ी हुई है" ....डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'. Show all posts

Sunday, 1 September 2019

तोंद झूठ की बढ़ी हुई है....डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

गीत  "तोंद झूठ की बढ़ी हुई है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

अब कैसे दो शब्द लिखूँ, कैसे उनमें अब भाव भरूँ?
तन-मन के रिसते छालों के, कैसे अब मैं घाव भरूँ?

मौसम की विपरीत चाल है,
धरा रक्त से हुई लाल है,
दस्तक देता कुटिल काल है,
प्रजा तन्त्र का बुरा हाल है,
बौने गीतों में कैसे मैं, लाड़-प्यार और चाव भरूँ?
तन-मन के रिसते छालों के, कैसे अब मैं घाव भरूँ?

पंछी को परवाज चाहिए,
बेकारों को काज चाहिए,
नेता जी को राज चाहिए,
कल को सुधरा आज चाहिए,
उलझे ताने और बाने में, कैसे सरल स्वभाव भरूँ?
तन-मन के रिसते छालों के, कैसे अब मैं घाव भरूँ?

भाँग कूप में पड़ी हुई है,
लाज धूप में खड़ी हुई है,
आज सत्यता डरी हुई है,
तोंद झूठ की बढ़ी हुई है,
रेतीले रजकण में कैसे, शक्कर के अनुभाव भरूँ?
तन-मन के रिसते छालों के, कैसे अब मैं घाव भरूँ?
--