Friday, 5 August 2022

कलम की सुगंध जमशेदपुर इकाई का सावन मिलन महोत्सव हुआ सम्पन्न



आज दिनांक 05.08.2022 को झारखंड कलम की सुगंध  की जमशेदपुर इकाई का "सावन मिलन महोत्सव" सम्पन्न हुआ। इस कर्यक्रम का आयोजन प्रान्त अध्यक्ष आरती श्रीवास्तव 'विपुला' जी के निवास स्थान पर था जिसमें अनेक साथियों ने अपनी सहभगिता दर्ज करवाई। सभी साथियों का उत्साहवर्धन करते हुए कलम की सुगंध के संस्थापक गुरुदेव संजय कौशिक 'विज्ञात' जी ने अपने शुभकामना संदेश में कहा -


कलम की सुगंध झारखंड प्रांत इकाई अध्यक्ष आरती श्रीवास्तव 'विपुला' जी के नेतृत्व में कलम की सुगंध परिवार "सावन मिलन" समारोह का कार्यक्रम आयोजित करने जा रहा है, यह बहुत ही हर्ष का विषय है। इस परिवार के सभी सदस्य अनेक विधाओं को आत्मसात करते हुए अपने अथक प्रयास से साहित्य की सेवा कर रहे हैं।  माता शारदे की कृपा से उनकी लेखनी निरंतर निखरती रहे और एक साहित्यकार होने के नाते समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए अपार सफलता प्राप्त करें इन्ही शुभकामनाओं के साथ मैं पूरे संचालक मंडल एवं सदस्यों का हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ कि उन्होंने इस मंच को अपने प्रयासों से सदैव ऊर्जावान बनाये रखा। कलम की सुगंध मिशन के अंतर्गत काव्य विधाओं को सीखने और सिखाने के इस उपक्रम को और गति मिले और सभी सदस्यों के बीच एक परिवार जैसी भावना विकसित हो यही हमारा उद्देश्य है। आरती श्रीवास्तव 'विपुला' जी अपने अथक प्रयास से सभी को एक सूत्र में बांधकर सफल नेतृत्व में परिवार का विस्तार कर रही हैं अतः उनकी और संचालक मंडल की जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है। यह अविस्मरणीय क्षण सदैव आपके जीवन को आनंद की अनुभूति कराते रहें और साहित्य से जुड़े रहने में सहायक सिद्ध हों इसी के साथ सभी को पुनः हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ। साथ आरती श्रीवास्तव विपुला जी को नूतन गृह की हार्दिक बधाई एवं हार्दिक शुभकामनाएँ प्रेषित करता हूँ  💐💐💐💐


अध्यक्ष -आरती श्रीवास्तव 'विपुला'

उपाध्यक्ष-निवेदिता श्रीवास्तव 'गार्गी'

महासचिव-वीणा पांडे 'भारती' एवं डा. संध्या सिन्हा 'सूफी

सचिव  मनीषा सहाय 'सुमन'

उपसचिव- सविता सिंह 'हर्षिता'

मंच संचालिका-  किरण कुमारी 'वर्तनी'


इन सभी के प्रयासों की जितनी भी सराहना की जाए कम है। प्रतिभा प्रसाद 'कुमकुम' जी, उपासना सिन्हा जी, रीना सिन्हा जी, रूबी लक्ष्मी सिंह जी, पूनम सिन्हा जी, और संतोष चौबे जी की उपस्थिति ने इस आयोजन को चार चाँद लगा दिए। सभी साथियों का हार्दिक आभार 🙏


इस आयोजन की कुछ अविस्मरणीय तस्वीरें आप सभी के साथ साझा करते हुए अत्यंत हर्ष की अनुभूति हो रही है।






















Sunday, 31 July 2022

विद्योत्तमा के लेख का पन्ना लेखिका - सुशीला जोशी 'विद्योत्तमा'


 विद्योत्तमा के लेख का पन्ना 

लेखिका - सुशीला जोशी 'विद्योत्तमा'



-मुंशी प्रेमचंद का यथार्थ मेरी दृष्टि में    .....         ^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^

         मुंशी प्रेमचंद की जब भी कोई विधा पढ़ने को मिली ,उसमें मुझे भारत ही नही सम्पूर्ण  धरा का यथार्थ नजर आया । सम्पन्न देशों में स्तर वैभिमन्य पर्याप्त देखने को मिलता है । झुग्गी झोपडियो में रहने वाले समुदाय से बहुत निकट से परिचय हुआ । भारत जैसे शोषित देश आतताइयों से जूझते हुए समाज के पूर्ण सौंदर्य के दर्शन हुए ।शायद इसीलिए नैतिक ,आर्थिक ,पारिवारिक ,सामाजिक व सांस्कतिक आंदोलनों के इतिहासों का परिचय संज्ञान में आया है । लगभग हर रचना में व्यवस्था दोष के प्रति उनके स्वर विद्रोही दिखाई पड़े । इसीलिए उनकी रचनाओं का केंद्र भारत के उपेक्षित गाँव ,वर्ण, जाति व मनुष्य रहा है । यद्यपि कहीं कहीं यथार्थ चित्रण के साथ साथ मुंशी जी की लेखनी आदर्शवादी भी बन पड़ी । मेरे विचार में जिसके पीछे उनका दृष्टिकोण पवित्रताओं ,पुण्यो व सांस्कृतिक व धार्मिक विश्वासों के प्रति जागृति लाना हो सकता है किंतु कर्मभूमि से कायाकल्प तक आते आते वे यथार्थवादी ही अधिक सिद्ध हुए ।

      प्रेमचंद को पढ़ने के बाद ज्ञात हुआ कि उनका व्यक्तिगत जीवन अनवरत संघर्षो की कहानी रहा है ।अपने स्त्वाधिकार और स्वाभिमान की निरन्तरता के लिए वे सर्वदा संघर्षरत रहे । उनका वास्तविक नाम धनपतराय था किंतु कभी धनपति नही बन सके और न ही किसी को धनपति बनने की राय ही दे पाए ।उनका जन्म एक बेहद पिछड़े बनारस के पास लमही गाँव  में हुआ था जहाँ हमेशा गरीबी ,शोषण व अभाव का नाच होता रहा   पिता अजायबराम गाँव के डाकखाने में मात्र 20₹ माह के वेतन पर क्लर्क के पद पर कार्यरत थे  । इसीसे मुफ़लसी से हाथ मिला खुश रहने की आदत डाल ली थी । आर्थिक कठिनाई को पीछे धकेलने में कभी मुंशी जी को मात्र पाँच रुपये ट्यूशन पढ़ाना पड़ता तो कभी अठन्नी का ऋण चुकाने व किसी बजाज से उधार लिए कपड़ो का बिल चुकता न कर सकने के कारण उसी की दुकान तरफ से गुजरना ही छोड़ना पड़ता । कभी किसी वकील के तबेले ऊपर टांट बिछा कर पड़ना पड़ता तो कभी दस पन्द्रह कोस पैदल चल घर आना पड़ता । इसी यथार्थवाद को भोगते हुए लिखने के कारण उनकी लेखनी ऋण-समस्या,शोषण,गाँव व अभाव के इर्द-गिर्द घूमती दिखाई पड़ी । अतः मेरा मत यह है कि मुंशी जी के यथार्थ चित्रण का कारण उनको अपनी  भोगवादिता है ।

            प्रेमचंद की लगभग सभी उपन्यासों व कथा-साहित्य में उस व्यवस्था दोष के दर्शन होते हैं जो आज भी पूरे भारत मे व्याप्त हैं ।इसीलिए उन्होंने मानवतावादी दृष्टिकोण अपना कर व्यवस्था -दोष के कारण बुरे लगने वाले पात्रों को भी सहज मानवीय संवेदनाओं और अपने लेखन को अव्यवस्थाओं को सुव्यवस्थित करने तथा सामाजिक ,आर्थिक ,नैतिक ,सांस्कृतिक व राजनीतिक मूल्यों की पुनर्प्राप्ति और रक्षा के आंदोलनों को अपने साहित्य का इतिहास बना डाला । इसके साथ ही समूचे भारत जीवन की समस्या ,इच्छा व आकांक्षाओं की स्पष्ट झाँकी के चितेरे बन बैठे ।दीन हीन किसानों ,ग्रामीणों व शोषितों की दलित अवस्था का मार्मिक चित्रण उनके साहित्य का वैशिष्ट्य बन गया । निर्मल ,गबन,गोदान ,पूस की रात ,कफ़न आदि के चरित्र इसके ज्वलन्त उदाहरण है ।

            प्रेमचंद जी के कथानक सीधे जीवन को विभिन्न क्षेत्रों से उठाए गए हैं । उनके उपन्यासों व कहानियों के विषय निम्न या मध्य वर्गीय जीवन ही रहे। इसीलिए उनमें वायवीयता व कृत्रिमता से बहुत दूर लगते हैं । आत्माराम ,शतरंज के खिलाड़ी ,कफ़न ,पूस की रात आदि कहानियों में उनकी सामयिक राजनीति व सामाजिक समस्याओं का चित्रण सर्वत्र बिखरा पड़ा सा लगता है । रंगभूमि व गोदान जैसे उपन्यासों में दो तीन कथानकों का समावेश भी दिखाई देता है । इसलिए वे अपने कथानकों  का उचित विकास भी नही कर पाए हैं । इसके पीछे शायद उनका उद्देश्य समाज सुधार ,ग्रामोत्थान या फिर दीन हीन किसानों व मजदूरों की जर्जर स्थिति को प्रकाश में लाना था । समसामयिक समस्याओं के विश्लेषण हेतु उन्होंने गांधीवादी विचारधारा के अनुरूप हृदय परिवर्तन व ट्रस्टीशिप जैसे सिद्धान्तों का प्रयोग कर कथानकों की समाजिक उपयोगिता को बढ़ावा देना था । इसी प्रयास व सूझ -बूझ के कारण प्रेमचंद जो उपन्यास -सम्राट बनने में सक्षम हो सके । निम्न वर्ग के प्रतिनिधि बन सके तभी तो पूरा  एक युग ,एक शताब्दी गुजर जाने के बाद भी हिंदी साहित्य के आज भी स्तम्भ माने जाते है ।

          कथानकों की भांति प्रेमचंद जी के पात्र भी अत्यंत सजीव ,सामयिक व व्यवहारिक रहें हैं । होरी हो या कफ़न का माधव ,पूस की रात का हल्कू हो या फिर मिस पद्मा का प्रसाद सभी समष्टि का प्रतिनिधित्व करते हुए अपना परिचय देते नजर आते है । हर पात्र अपनी निश्चित अनिवार्यता में जीते से दिखाई देते हैं । इसीलिए होरी और माधव को आज तक कोई नही भुला पाया ।

              कहीं कहीं उनके उपन्यासों में पात्रों की भीड़ नजर आती है । जो पर्याप्त भौतिक लगती है ।किंतु उस भीड़ में अकस्मात अकारण अनेक पात्रों की मृत्यु अवश्य कृत्रिम लगती है जो बहुत अखरती है । गबन की वेश्या जोहरा सामान्य धरातल पर आ कर भी समाज द्वारा स्वीकृत किये जाने के भय से गंगा में बहा दी जाती है ।इसका कारण कथानक के प्रसार के समय मुंशी जी द्वारा पात्रों की भीड़ में छटनी कराना लगता है क्योकि शायद अंत तक लेखक उस भीड़ के साथ चलना सम्भव नही लगता ,फिर भी कहना पड़ेगा कि कभी कभी इस प्रकार की घटनाएँ अनिवार्य भी लगती है जैसे गबन की जोहरा ।

           संवाद योजना के धरातल पर प्रेमचंद जी काफी सशक्त दिखाई देते हैं । उनके साहित्य का कथावस्तु विकास पात्रों के अंतर व वाह्य चित्रण को प्रस्तुत करने में पूर्ण समर्थ व सक्षम दिखाई पड़ता है ।संवाद सरल ,सर्सव संक्षिप्त होते हुए भी कहीं कहीं वैचारिक स्तिथि भी भाषण के समान लगती है ।गोदान के मेहता के  संवाद  इसका एक उदाहरण है ।संवाद में सूक्ति के प्रयोग के कारण सरस् व महत्वपूर्ण बन पड़े ।

          देश काल व वातावरण की दृष्टि से भी प्रेमचंद की लेखनी एकदम सटीक है। उनके साहित्य में देश काल को अमरत्व प्राप्त है ।उनके कथानक के वातावरण में पात्रों की समस्या ,अवश्यताएँ व उनका समाधान बड़ी कुशलता से उभार पाए हैं शायद इसीलिए उनका साहित्य बोलते युग का सा लगता है ।

उनके चित्रण वर्णनात्मक होते हुए भी एक पूरे विश्व का भूगोल लगता है जो अपनी कहानी आप कहता सा लगता है ।

          प्रेमचंद जी आम जनता के लेखक थे इसीलिए उन्होंने संस्कृति निष्ठ या पुस्तकीय भाषा को छोड़ कर एतिहासिक वर्णनात्मक भाषा का प्रयोग किया  है । कहीं कहीं अपने साहित्य में वह स्वयं परिलक्षित होते है । शायद इसका कारण उनके मन मे जीवन और समाज द्वारा भोगे गए यथार्थ की पीड़ा हो सकती है ।


सुशीला जोशी, विद्योत्तमा

मुजफ्फरनगर उप्र

Wednesday, 13 July 2022

गुरु पूर्णिमा : कलम की सुगंध

 आज दिनांक 13.07.2022 को गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर कलम सुगंध परिवार द्वारा गुरुदेव संजय कौशिक 'विज्ञात' जी को समर्पित एक ई- पुस्तिका का प्रकाशन किया गया जिसका नाम "गुरु पूर्णिमा - विज्ञात गीतिका माला" है। साथ ही कुछ साथियों को साहित्यिक उपनाम प्रदान कर उनके उज्ज्वल भविष्य की मंगल कामनाएँ भी की गई। गीतिका शतकवीर के मध्य सम्पन्न हुआ यह कर्यक्रम सभी साथियों के लिए हर्ष की अनुभूति कराने वाला था। मंच पर उपस्थित सभी कवि कवयित्रियों को संबोधित करते हुए गुरुदेव संजय कौशिक 'विज्ञात' जी ने कहा कि --

गुरु पूर्णिमा क्या है ? यदि किसी को इसकी परिभाषा सीखनी हो तो इस मंच से उत्तम परिभाषा अन्यत्र कहीं नहीं हो सकती एक दिन को पर्व तथा पर्व को उत्सव जैसा मनाते-मनाते मंच पर उपस्थित रचनाकारों का आपसी स्नेह उसे फिर एक महोत्सव का रूप दे देता है। यह विलक्षण सा कार्य इस मंच के अतिरिक्त मुझे नहीं लगता हो भी सकता है । आप सभी को गुरु पूर्णिमा महोत्सव की हार्दिक बधाईयाँ एवं शुभकामनाएँ💐💐💐 आप सभी की लेखनी निरन्तर सुधार प्राप्त करती हुई एक धार प्राप्त करके अपने प्रवाह में अवश्य बहेगी सतत श्रम कभी भी दाएँ बाएँ से होकर नहीं गुजरता उसे सफलता के साथ आलिंगनबद्ध होना ही पड़ता है। आप सभी अपनी लेखनी के माध्यम से अपने निर्धारित लक्ष्य को शीघ्र प्राप्त करें ....



कुछ रचनाएँ आप सभी के सामने प्रस्तुत करने जा रहे हैं उनका आनंद लेकर साथियों का उत्साह वर्धन अवश्य करें 🙏






इस अवसर पर साथियों द्वारा प्रेषित कुछ रचनाएँ ....





















 कलम की सुगंध परिवार के इन अविस्मरणीय क्षणों के साक्षीदार बनकर आपको भी हर्ष की अनुभूति निश्चित ही हुई होगी। हम हृदयतल से आपका आभार व्यक्त करते हैं इस ब्लॉग पर आकर इस पोस्ट को पढ़ने के लिए 🙏




Thursday, 24 February 2022

शोधपत्र : वर्तमान संदर्भ में रचनात्मक लेखन के विविध आयाम


शोधपत्र तथा शोधसार प्रेषित करने की अंतिम तिथि - 07 मार्च 2022 
अणुडाक -dranitabhardwaj2011@gmail.com

भूमिका 
विषय वस्तु 
मुख्य अंश 
परिणाम व सुझाव सहित लिखना है।

शोध पत्र 
1000 से 1500 शब्द में 
शोध सार 
200 से 250 शब्द में


 आइये आज जानते हैं कि शोध पत्र कैसे लिखें 

शोधपत्र का अर्थ (Meaning Of Research Paper)- क्या है ? 

शोधपत्र, शोध रिपोर्ट या शोध कार्य का व्यावहारिक प्रस्तुति योग्य सार आलेख है जो परिणाम को अन्तिम रूप में समेट भविष्य की दशा तथा दिशा निर्धारण में सहयोग कार्य करता है। 

“पत्र पत्रिकाओं (Journals) में प्रकाशित होने वाले अथवा संगोष्ठियों (Seminars) व सम्मेलनों (Conferences) में वाचन हेतु तैयार किये गए अनुसन्धान कार्य सम्बन्धी लेखों को प्रायः अनुसंधान पत्रक (Research Paper) का नाम दिया जाता है।”


शोध प्रपत्र लेखन कार्य आलोचनात्मक, सृजनात्मक तथा चिंतनशील स्तर का है। शोध प्रपत्र लेखन में एक विशिष्ट प्रक्रिया का अनुसरण करना होता है जिसमें समुचित क्रम को अपनाया जाता है।”

अतः उक्त आलोक में कहा जा सकता है कि शोध प्रपत्र सम्पूर्ण शोध के परिणाम व सुझाव से युक्त वह प्रपत्र है जिसमें स्व विचार के स्थान पर तथ्य निर्धारण तत्पर शोध आधारित दृष्टिकोण से वास्ता रखता है।

शोध प्रपत्र के प्रकार (Types Of Research Paper)-

कुछ विद्वतजनों द्वारा सुझाये गए सुझावों को कुछ विशेष प्रकारों को इस प्रकार क्रम दे सकते हैं –

विवाद प्रिय या तार्किक शोध पत्र (Argumentative Research Paper)

कारण प्रभाव शोध पत्र (Cause and Effect Research Paper)

विश्लेणात्मक शोध पत्र (Analytical Research Paper)

परिभाषीकरण शोध पत्र (Definition Research Paper)

तुलनात्मक शोध पत्र (Contrast Research Paper)

व्याख्यात्मक शोध पत्र (Interpretive Research Paper)

शोध प्रपत्र का प्रारूप (Research Paper Format)-

शोध पत्र लिखने का कोई पूर्व निर्धारित प्रारूप सभी प्रकार के शोध हेतु निर्धारित नहीं है शोध कर्त्ता का सम्यक दृष्टि कोण ही शोध प्रपत्र का आधार बनता है फिर भी अपूर्णता से बचने हेतु सभी प्रमुख बिंदुओं को सूची बद्ध कर लेना चाहिए। दिशा, प्रवाह, अनुभव, अवलोकन सभी से शोध पत्र को प्रभावी बनाने में मदद मिलती है सामान्यतः शोध प्रपत्र प्रारूप में अधोलिखित बिन्दुओं को आधार बनाया सकता है। –

(अ)- भूमिका

(ब)- विषय वस्तु

(स)- मुख्य अंश

(द)- परिणाम व सुझाव

संक्षेप में भूमिका लिखने के बाद विषय वस्तु से परिचय कराना चाहिए यहीं शोध शीर्षक के बारे में लिखकर मुख्य अंश के रूप में शोध प्रक्रिया, उपकरण व प्रदत्त संग्रहण, विश्लेषणआदि के बारे में संक्षेप में लिखते हुए प्राप्त परिणामों को सम्यक ढंग से प्रस्तुत करना चाहिए व इसी आधार पर सुझाव देने चाहिए अपने दृष्टिकोण को थोपने से बचना चाहिए।


अच्छे शोध प्रपत्र की विशेषताएं (Characteristics Of a Good Research Paper ) या

अच्छे शोध प्रपत्र के लाभ (Advantage Of a Good Research Paper )-

शोध प्रपत्र लिखना और सम्यक सन्तुलित शोध प्रपत्र लिखने में अन्तर है अतः प्रभावी शोध पत्र लिखने हेतु आपकी जागरूकता के साथ निम्न गुण, विशेषताओं का होना आवश्यक है तभी समुचित लाभ प्राप्त होगा।

(1 )- नवीन ज्ञान से संयुक्तीकरण।

(2 )- शोध कार्यों सम्बन्धित दृष्टिकोण का सम्यक विकास।

(3 )- पुनः आवृत्ति से बचाव।

(4 )- परिश्रम को उचित दिशा।

(5 )- विभिन्न परिक्षेत्र के शोधों से परिचय।

(6 )- समीक्षा में सहायक।

(7 )- विशेषज्ञों के सुझाव जानने का अवसर।

(8 )- शक्ति व धन की मितव्ययता।

(9 )- अनुभव में वृद्धि।

(10 )- प्रसिद्धि में सहायक।

सम्पूर्ण शोध पत्र लेखन के उपरान्त यदि वैदिक काल की मर्यादा के अनुसार सन्दर्भ ग्रन्थ सूची भी देनी अनिवार्य होती हैं ताकि कृतज्ञता ज्ञापन के साथ-साथ दूसरे शोध कर्त्ताओं को मदद प्राप्त हो सके ।



Saturday, 5 February 2022

कलम की सुगंध साहित्यिक उपनामकरण समारोह 2022




बसंत पंचमी के पावन अवसर पर कलम की सुगंध परिवार द्वारा आज दिनांक 5.2.2022 को दोपहर 12:30 बजे साहित्यिक उपनामकरण समारोह का आयोजन किया गया। इस आयोजन में सभी को उनके लेखन कौशल को देखते हुए आकर्षक उपनाम प्रदान किये गए। 












सभी साथियों को बधाई देते हुए गुरुदेव संजय कौशिक 'विज्ञात' जी ने कहा -


 माँ वीणापाणि की असीम अनुकम्पा आप सभी पर बनी रहे। आज बसंत पंचमी के पावन पर्व पर गत वर्षों की भांति साहित्यिक उपनामकरण समारोह के आयोजन में 9+2= 11 कवि एवं कवयित्रियों को साहित्यिक उपनाम दिया जा रहा है। माँ वीणापाणि आपको साहित्य जगत में स्थापित कर आपकी लेखन शैली को निखार सहित निर्विघ्न कथन प्रवाह, रस प्रवाह, सशक्त कथ्य, छंदोबद्ध लेखन, शब्द-शक्ति से परिपूर्ण कर आलंकारिक दृष्टिकोण तथा नव्यता का नूतन परिवेश दें माँ वीणापाणि से इस प्रकार विनम्र भाव से प्रार्थना के पश्चात आपके लेखन में चमत्कृत ढंग से चमकने तथा तथा पाठकों द्वारा नित्य सराहे जाने की मंगलमयी कामना प्रेषित करता हूँ ...

आप सभी प्रदत्त उपनाम के साथ साहित्य जगत में अपनी उपास्थिति को दर्शाएँ और नित निरंतर प्रगति पथ पर बढ़ते रहें ... 💐💐💐 

प्राप्त उपनाम का यश चहुँ दिश शुक्ल पक्ष के चंद्रमा की तरह नित निरन्तर बढ़ता रहे अनंत बधाई एवं हार्दिक शुभकामनाएँ 💐💐💐


- संजय कौशिक 'विज्ञात'

पूरे परिवार के लिए यह अवसर अत्यंत हर्षपूर्ण रहा। अनेक कवि कवयित्री इस अविस्मरणीय क्षण के साक्षी बने। सभी साथियों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ  💐💐💐




Thursday, 6 January 2022

मुहावरेदार लेखन - परमजीत सिंह 'कोविद' कहलूरी

 

गुरुदेव संजय कौशिक 'विज्ञात' जी की प्रेरणा से कलम की सुगंध विज्ञात नवगीत माला मंच पर मुहावरेदार लेखन पर कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस आयोजन में आदरणीय परमजीत सिंह 'कोविद' जी ने सभी का मार्गदर्शन किया। इस चर्चा का कुछ अंश आप सभी के सामने प्रस्तुत करने जा रहे हैं ताकि आप भी उसका लाभ उठा सकें।

संचालक : नीतू ठाकुर 'विदुषी' 

मुख्य वक्ता : परमजीत सिंह 'कोविद' कहलूरी




प्रश्न:-1मुहावरेदार कथन क्या है??


उत्तर:- आमतौर पर हमने देखा है कि मुहावरे जो भी बात कहते हैं उसका अर्थ कभी भी स्पष्ट रूप से नजर नहीं आता। मुहावरे की भाषा हमेशा संकेतिक होती है। मुहावरा कम शब्दों में किसी बड़ी बात की ओर संकेत करता है।


अर्थात संक्षेप में कहा जाए तो मुहावरेदार कथन का अभिप्राय यही है कि हम अपने वक्तव्य को कुछ इस तरह से प्रस्तुत करें कि उसका अर्थ सीधा और सपाट ना होकर किसी और अर्थ का संकेत करे।


प्रश्न -2 नवगीत संरचना में मुहावरेदार भाषा का चयन जरूरी क्यों?


उत्तर:- ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार मुहावरा सुनने में अच्छा लगता है और समझने में हम उस आनंद लेते हैं उसी प्रकार एक नवगीत की संरचना में मुहावरेदार भाषा काम करती है कवि अपने शब्दों को कुछ इस तरह से व्यक्त करता है कि उसके वाक्य मुहावरों की तरह किसी अलग दिशा में संकेत करते जाते हैं और नवगीत का एक नया और स्पष्ट अर्थ दर्शाते जाते हैं। इसीलिए नवगीत में मुहावरेदार और लच्छेदार भाषा का प्रयोग करने के लिए कहा गया है।


प्रश्न:-3 क्या सीधे और स्पाट वाक्यों वाली रचना को नवगीत स्वीकारा जा सकता है?


उत्तर:- नहीं ऐसा बिल्कुल नहीं है।

नवगीत की विशेषता ही इसे स्वीकार आ गया है कि इसमें स्पाट कथन वर्जित हैं। कभी को अपनी बात सीधे-सीधे रखने पर मनाही है क्योंकि सीधे और सपाट कथन गीत का हिस्सा तो हो सकते हैं पर नवगीत का नहीं।

घुमावदार कथन के साथ-साथ मुहावरेदार और लच्छेदार भाषा से नवगीत में चार चांँद लग जाते हैं।


प्रश्न:-4 मुहावरेदार भाषा का प्रयोग किस तरह किया जाए?


मुहावरेदार भाषा के प्रयोग के लिए अपनी रचना से संबंधित कुछ मुहावरेदार शब्द समझ में रखिए और नए बिंब का प्रयोग करके उसके कथन पर मुहावरेदार भाषा को जोड़िए। साथ में यह बात ध्यान रखने योग्य है कि आप अपने रचना के अर्थ को साथ लेकर आगे बढ़ते रहें।मुहावरेदार भाषा के प्रयोग के लिए यह आवश्यक नहीं है कि जो मुहावरे पहले से चलन में हैं आप उन्हीं का प्रयोग करें बल्कि आप अपने बनाए हुए नए कथन भी शामिल कर सकते हैं। अपनी बातों को घुमा फिरा कर मुहावरों की तरह पेश करते जाएंँ। ताकि आपकी रचना रहस्यमई लगे। रचना के अर्थ संकेतिक भाषा में और प्रतीकों के माध्यम से बताए जाएँ।

बिंब जो काम करता ना हो वह काम उससे करवाना है। जिससे रचना आकर्षित लगे और पाठकों को इसका आनंद आए।


प्रश्न:-5

निर्धारित मापदंडों पर यदि आपकी रचना सही ना उतरे तो विचलित होने की आवश्यकता है या नहीं??


आदरणीया हेमा जोशी जी का प्रश्न


उत्तर:- मेरे विचार से यदि आपकी रचना निर्धारित मापदंडों पर सही नहीं उतर रही है फिर भी आपको घबराने की आवश्यकता नहीं है। आपको अनवरत प्रयास करते रहना है क्योंकि प्रयास से ही रचना श्रेष्ठ होगी।यदि आपकी रचना नवगीत विधा में मान्य नहीं हो तो भी वह किसी न किसी विधा में मान्य जरूर होगी क्योंकि रचना तो रचना है उसमें आपने अपने भावों को सृजित किया है। शब्दों को पूरी मेहनत से उकेरा है और एक निश्चित शैली में माला के रूप में पिरोया है तो निश्चित रूप से घबराने की या विचलित होने की आवश्यकता नहीं है आपका लगातार लिखने का प्रयास ही आप को महान साबित करता है अपनी हर एक कमी को पूरा करते हुए धीरे धीरे रचना के निर्धारित मापदंडों पर एक ना एक दिन आपकी रचना उत्कृष्ट अवश्य बनेगी ऐसा मेरा मानना है।


नवगीत की विशेषताएं


1.जड़ाऊ शिल्प

2.श्रेष्ठ तुकांत

3.घुमावदार भाषा

4.मुहावरेदार कथन

5.बोलते बिंब

6. शब्दों का सटीक चयन

7. घनिष्ठ संबंधित प्रतीक