Sunday, 29 September 2019

उम्मीद....धनेश्वरी देवांगन "धरा "

*विधा---------गज़ल*
*बिषय------उम्मीद*
********************************
वफ़ा खातिर मैंने उम्मीद का लौ जलाये रखा ।
आशियाना तोड़ कर तुमने गुलशन सजाये रखा ।

एक ही पल में क्यूँ आखिर ढहा दिया तुमने उसे  ?
वो ऐतबार का महल जो था हमने बनाये रखा ।

हमको नाज़ था तुमपर ,और शायद था खुद पर भी, 
दिले गुलशन में जाने कितने फूल‌ महकाये रखा ।

तेरी ही आरजू चाहत उम्मीद जिक्र फ़क्र है ,
बड़ी मुद्दत से ही दिले तमन्ना को दबाये रखा ।

तुझे कद्र नहीं वफा की, वफादारी की ,सितमगर ,
वफ़ा की उम्मीद हमने बेव़फा से लगाये रखा । 

टूटता है दिल तो सदाऐं दूर तलक जाती है, 
बिखर गये हैं टूकड़े जो बरसों से बचाये रखा ।

दीवानगी ,बेकरारी ये क्या कम नहीं है "धरा" ,
अक्सो ख्वाब शिद्दत से पलकों में जो बिठाये रखा ।

****************************************

*धनेश्वरी देवांगन "धरा"*
*रायगढ़,छत्तीसगढ़*

उम्मीद ... बंदना पंचाल


विषय - उम्मीद
विधा - काव्य
***********************
विपदाओं  से लडने दो
उपवन में आंधी चलने दो,
मंज़िल भी मिल जाएगी,
उम्मीद के सुमन खिलने दो।

यह जीवन है संघर्ष भरा
मुस्कान लिए बस बढ़ना है।
फूलों के जैसा खिलना है
नदियों के जैसा बहना है।

डगमग करते कदमों को
धीरे धीरे  अब संभलने दो,
मंज़िल भी मिल जाएगी,
उम्मीद के सुमन खिलने दो।

कंटक -पथ कलियों की
चाह कभी भी मत करना।
चोट अगर लग जाए भी
तो आह कभी भी मत भरना ।

अलसायी सी  इन आंखों में
फिर से ख्वाब संवरने  दो।
मंज़िल भी मिल जाएगी,
उम्मीद के सुमन खिलने दो।

चल छोड़ निराशा बढ़ आगे,
मजबूत कर कच्चे धागे।
दिन रात पसीना बहाए जो
भाग्य उसी के ही जागे।

दीप जलाओ आशाओं के
सांझ अंधेरी ढलने  दो,
मंज़िल भी मिल जाएगी।
उम्मीद के सुमन खिलने दो।

*********************
     बंदना पंचाल
     अहमदाबाद
**********************

उम्मीद ...इन्द्राणी साहू "साँची"


विषय - उम्मीद
विधा - गीत 
***************
मात्रा भार 14 - 14
***************
"मन उम्मीद जगाता चल ,
मंजिल मिलती जाएगी ।।"
***
बोध ज्ञान का हो जाए ,
मत रहो माया में लिप्त ।
प्रखर प्रज्ञा जगा रखना ,
चेतना को रखो प्रदीप्त  ।
आगे कदम बढ़ाता चल ,
राहें चलती जाएगी ।
मन उम्मीद जगाता चल ,
मंजिल मिलती जाएगी ।।
***
ज्ञान यज्ञ की ज्योति जला ,
पथ आलोकित कर देना ।
उपवन हो वीरान भले ,
उसमें सुमन खिला लेना ।
पथ से कण्टक चुनता चल ,
बगिया खिलती जाएगी ।
मन उम्मीद जगाता चल ,
मंजिल मिलती जाएगी ।।
***
आँधी में भी बुझे नही ,
ऐसा दीपक बन जाना ।
छोड़ निराशा का दामन ,
आशा को ही अपनाना ।
सच का दीप जलाता चल ,
ज्वाला जलती जाएगी ।
मन उम्मीद जगाता चल ,
मंजिल मिलती जाएगी ।।
***
जीवन हो संघर्ष भरा ,
मुख मुस्कान सजा रखना ।
बुलन्दियों को छू लोगे ,
हिम्मत सदा बड़ा रखना ।
दृढ़ संकल्प उठाता चल ।,
विपदा गलती जाएगी ।
मन उम्मीद जगाता चल ,
मंजिल मिलती जाएगी ।।
******************************
✍️इन्द्राणी साहू "साँची"✍️
    भाटापारा (छत्तीसगढ़)
★★★★★★★★★★★★★★★

Sunday, 22 September 2019

मेहंदी महावर...मधुमिता घोष"प्रिणा"



मेहंदी महावर देखो
गोरी के हाथों रची है
गोरी साजन की दुल्हन बनी है
गोरी साजन की दुल्हन बनी है

अंग में सजे तेरे लाल सा जोड़ा
लाल से जोड़े में गोटे का फेरा
गोटे के फेरे में गोरी की भृकुटी तनी है
गोरी साजन की दुल्हन बनी है-2
मेहंदी महावर....................

हाथों में सजे तेरे लाल-लाल चूड़ी
लाल-लाल चूड़ी बीच चूड़ा सुनहरा
सुनहरे चूड़े की चूड़ी से देखो ठनी है
गोरी साजन की दुल्हन बनी है-2
मेहंदी महावर.....................

पावों में तेरे महावर की लाली
महावर की लाली में नूपुर की जाली
नूपुर की जाली में साजन की धड़कन थमी है
गोरी साजन की दुल्हन बनी है-2
मेहंदी महावर...................

      मधुमिता घोष"प्रिणा"
      राजपुर,बलरामपुर

साजन के संग...सुशीला साहू "शीला"

मेंहदी हाथों में लगवाऊं,
      खुशी के हर पल खिलखिलाऊं।
महावर लागे पांव में हरदम,
       पायल छमके छम छम।
रचे मेंहदी सुन्दर हाथों में लाली,
        जैसे दिखे सुन्दर सी प्याली ।
मन निर्मल रखूं मै प्रतिपल,
       साथ निभाऊं जीवन के हर पल।
मेंहदी लगी है खुशियां अपार,
       तन मन रिझ उठा नयन सुखार।
सखियों के साथ मौज मनाऊं,
        साजन के संग मैं इठलाऊं।
सबके दुख सुख का है ऐहसास,
        पिया के नाम की मेंहदी है मेरे पास।
मेंहदी हाथों की लाली होती,
         महावर पैरों की शोभा बढ़ाती।
माथे पे सजे सुहाग की निशानी,
         सुहाग सिन्दुर चमके बिंदिया रानी।
सुंदर मेंहदी पति को लगे प्यारी,
        लाली चुनरी प्रित मन लागे न्यारी ।

स्वरचित रचना✍️
सुशीला साहू "शीला"
शिक्षिका..
रायगढ़ (छत्तीसगढ़)

ओढ़े घूँघट लाज का...पुष्पा गुप्ता "प्रांजलि"



ओढ़े  घूँघट  लाज  का, कर  सोलह  श्रंगार।
पिया मिलन को है चली, एक सुहागन नार।।

खूब निखारा रूप को, और सँवारे केश।
सेंदुर भरके माँग मे, धरे दुल्हन का वेश।।

नैन नशीले दो सखी, है कजरे की धार।
पिया मिलन........

रचा *मेंहदी* हाथ में, लिख प्रियतम का नाम।
खनकें कंगन चूड़ियाँ, सजनी आठों याम।।

पाँव *महावर* है लगा, पायल की झनकार।
पिया मिलन को.......

कटि में करधन बाँध के, चले निराली चाल।
जूड़ा, गजरा, नौलखा, नाक नथनियाँ, डाल।।

होठों में लाली लगी, बिंदिया पे बलिहार।
पिया मिलन को......

नाम- पुष्पा गुप्ता *प्रांजलि*
पता- कटनी (म.प्र.)

Wednesday, 4 September 2019

मैं जोकर बन जाऊँगा....सरोज दुबे

मुझको मां एक टोपी ला दे
आड़े तिरछे वस्त्र सिला दे
नाक के ऊपर नाक लगा दे

मैं जोकर बन जाऊँगा।

सजा-धजा जोकर बनवा दे
तरह-तरह के पोज सिखा दे
रोतों को हंसना सिखला दे।
अब पैरोडी गाऊँगा,

मैँ जोकर बन जाऊँगा.......

तेरा-मेरा भेद मिटाकर
कुछ रोकर या मुस्काकर
जीवन का कुछ अर्थ बताकर
दुनियाँ को सिखलाऊंगा,

मैं जोकर बन जाऊँगाl

सरोज दुबे 
🙏🙏🙏🙏🙏